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ManishSrivastav
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कश्मीर घाटी के इतिहास के सबसे घातक हमले के बाद कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर चर्चा करके हम यह देेेख सकते हैं कि भविष्य में क्या कुछ हो सकता है। ये तमाम बातें बहुत परेशान करने वाली हैं। सबसे पहली बात तो यह कि 2014 के बाद से घाटी में हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसकी कई वजह हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह यही है कि भारत सरकार ने 2014 के पहले के 10 वर्षों में हासिल लाभ को गंवा दिया। सरकार ने अधिक से अधिक कश्मीरियों को देश की मुख्य धारा के साथ जोड़ने के बजाय, कश्मीर को एक राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया। ऐसा नहीं है कि 2014 के पहले घाटी स्वर्ग जैसी थी, लेकिन तक से अब तक हिंसा की घटनाओं में जो इजाफा हुआ है, वह आंकड़ों में स्पष्ट नजर आ रहा है। केद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद के समक्ष आतंकवाद के जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, उनमें निरतर इजाफा नजर आया है वर्ष 2014 में जहां 222 आतंकी घटनाएं हुई थीं वहीं, 2018 में इनकी तादाद 614 हो गई। 2014 में जहां 47 सुरक्षा जवान शहीद हुए थे, वहीं 2017 में 80 और 2018 में 91 जवानों की मृत्यु हुई।
जब मोजूदा सरकार सत्ता में आई, तो उसने नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से जारी संघर्ष विराम से अलग रुख अख्तियार किया। इसका उद्देश्य घुसपैठ का मुकाबला करना था। इससे आतंकी घटनाओं में कमी नहीं आई न ही असली समस्या दूर हुई। यही कारण है कि एक बार फिर कश्मीरी युवा बंदूक उठाते नजर आ रहे हैं। यह बात सन 1990 के दशक की याद दिलाती है जब कश्मीरी युवाओं का हथियार उठाना आम होता था। विदेशी आतंकिया को लेकर चिंतित होने के बजाय हमें स्थानीय युवाओं में बढती कट्टरता चिंचित अवश्य करनी चाहिए। पुलवामा में कार बम से हमला करने वाला 20 वर्षीय युवा भी ऐसे ही लोगों में से एक था। देश के युवाओं में आतंक के प्रति झुकाव दूसरा बिंदु है। तीसरी चिंता है इस्लामिकों की रणनीतियों में आ रहा बदलाव इन नीतियों को आसानी से बदला जा सकता है। दुनिया भर के उपद्रवियों और आतंकियों के कार्य व्यवहार का अनुकरण करके ऐसा किया जा सकता है।