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AmritpalYadav
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सदियों से वे जिस जंगल को अपना घर मानते थे, अब उसे खाली करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने वनों में रहने वाले 11 लाख से ज्यादा परिवारों की वनभूमि पर दावेदारी को खारिज कर दिया है और प्रदेश सरकारों से कहा गया है कि 27 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई से पहले इन जंगलों को खाली करवा दिया जाए। इस फैसले के बाद भी अगर वे वहां बने रहते हैं, तो उन्हें अनधिकृत कब्जेदार माना जाएगा। यहां 16 राज्यों के 11 लाख से ज्यादा परिवारों की दावेदारी खारिज हुई है। जो इस दावेदारी में शामिल नहीं थे, उन्हें भी जोड़ लिया जाए, तो शायद एक करोड़ के आस-पास आबादी को अब उन जंगलों से बाहर आना होगा। सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे देश पर लागू होगा, इसलिए अन्य राज्य भी इस पर कार्रवाई को बाध्य होंगे। यह फैसला जिस तरह से आया है, उसमें सरकार भी घिर रही है। मामले की पिछली सुनवाई 13 फरवरी को थी। लेकिन उस दिन सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से कोई वकील पहुंचा ही नहीं, इसलिए इस पूरे मामले में केंद्र का पक्ष सामने आ ही नहीं सका। बहरहाल, अदालत की तीन सदस्यों वाली पीठ का यह फैसला उस समय आया है, जब अगला आम चुनाव बहुत दूर नहीं है और इसे लेकर राजनीतिक गुणा-भाग भी अभी से होने लगे हैं।
विडंबना यह है कि इस मामले की जड़ में 2006 का वह कानून है, जो वनवासियों को जंगल की भूमि पर अधिकार देता है। यह अंग्रेजों के जमाने में बने वन कानून की जगह लेने के लिए बनाया गया था। जब यह कानून बना था, तब वन्य जीवन पर काम करने वाले कई संगठनों ने इसका विरोध किया था और कहा था कि इससे तो देश के जंगल ही खत्म हो जाएंगे। इसके बाद ही उन लोगों की पहचान शुरू की गई, जिनकी जंगलों की जमीन पर दावेदारी है। पिछले साल नवंबर तक 42 लाख से ज्यादा लोगों ने यह दावेदारी की थी। उसी समय जब इन दावों की समीक्षा की गई, तो 19 लाख लोगों की दावेदारी सीधे तौर पर खारिज कर दी गई। लगभग इतने ही लोगों की दावेदारी को वैध माना गया और बाकी का मामला लंबित रहा। जिनकी दावेदारी खारिज कर दी गई, उनमें से ज्यादातर ने अदालत की शरण ली और वहां भी उनकी दावेदारी खारिज हो गई है। इसी के साथ इसमें वह मामला भी जुड़ गया है, जिसमें कुछ संगठनों ने इस कानून की वैधता को ही चुनौती दी है।