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ौलत और शौहरत तो हर कोई है चाहता, कोई लेकर आया लेकर है जाता फिर क्‍यों है इस पर इतना घमण्‍ड दिखाता। एक तेरा कर्म ही दो गज की कब्र में भी काम है आता। क्‍या हिन्‍दू क्‍या मुस्लिम और क्‍या ईसाई, क्‍या कभी एकता की कसम तुमने खाई ? ना जाने उसके मन में क्‍या होगी आई, जब उसने ये दिव्‍य दूनिया होगी बनाई। दुनिया की दौलत समटेता रह जाएगा, कब तुझे परमात्‍मा याद आएगा? ये समय फिर वापस आएगा, और जीवन युही अंत हो जाएगा। हम ज्‍यादा खर्च तो करते है। परन्‍तु आनन्‍द नहीं हैं। हमारे पास बड़ा मकान तो है। परन्‍तु उसमें रहने वाला परिवार छोटा है। इसलिए हमें एकता से रहना चाहिए। हमारे पास समय की कमी है। इसीलिये समझौते ज्‍यादा है। दोस्‍ता एक बात सुनों जरा ध्‍यान देना दोस्‍तों जीना किस का नाम है - शरीर को चंगा रखो। दिमाग को ठंडा रखो। जेब का गरम रखो। आँखों में शरम रखो। जुबान को नरम रखो। दिल में रहम रखो। क्रोध पर लगाम रखो। व्‍यवहार को साफ रखो। होटो पर मुस्‍कुराइट रखो। फिर स्‍वर्ग में जाने की। क्‍या जरूरत यही स्‍वर्ग है। स्‍वस्‍थ रहो व्‍यस्‍त रहो। मस्‍त रहो सदा खुश रहो। लोग कहते है- जिसे हद से ज्‍यादा प्‍यार करों, वो प्‍यार की कदर नहीं करता। पर सच तो यह है कि- प्‍यार की कदर जो भी करता हैं, उसे कोई प्‍यार ही नहीं करता। अच्‍छे कल की चाह में, आज खोता रहा, जो मिला उसे भूल, नहीं के लिए रोता रहा। आरजू करता रहा उजाले की उम्र भर ,न हो सका ऐसा , बीज जो अंधेरे का बोता रहा। जो चाहा उस राह से अक्‍सर भटकती रही जिंदगी ,चहती रही अपनी मर्जी से अनचाहा होता रहा। क्‍यों कहें इसे बंधन परंपरा नजरिया या डर जिसका कारण जाना उन धारणाओं का ढोता रहा। विवशता थी या अवसरों की नजरअंदागी ,जाने क्‍यों अक्‍सर खुली आंखों से सोता रहा। खुदा ने ये वादा नहीं किया की असमान हमेशा नीला ही रहेगा, जिंदगी भर फूलों से भरी राहें मिलेंगी, खुदा ने ये वादा नही किया की सूरज है तो बदल नहीं होंगें,खुशी है तो गम नहीं, सुकून है तो दर्द नहीं होगा रास्‍ते में अगर मंदिर दिखे और प्रार्थना ना करों तो चलेगा पर रास्‍ते में एम्‍बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरुर करना क्‍या पता, शायद कोई जिंदगी आपकी दुआआँ से बच जाये धन्‍यवाद।
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