words per minute
8
SangeetaYadav5172
00:00
Speed
आतंकी संगठनों के वित्तीय स्रोतों पर निगाह रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था फइनेंशियल एक्शन टॉस्क फोर्स यानी एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जिस तरह ग्रे सूची में बनाए रखने का फैसला किया उससे यही पता चलता है कि आतंकवाद का निर्यात करने वाला यह पड़ोसी देश अपनी हरकतों से बाज आने के बजाय आतंकियों के ढांचे को बनाए रखे हुए है। एफएटीएफ ने यह पाया कि पाकिस्तान ने उसके निर्देशों पर मामूली रूप से ही पालन किया। इस संस्था ने उसे इसके लिए चेताया भी कि वह आतंकी ढांचे को खत्म करने के प्रति गंभीर नहीं और अगर उसने अपने रवैये को नहीं बदला तो उसे काली सूची में डाला जा सकता है। निःसंदेह यह पाकिस्तान को शर्मसार करने और उसके असली चेहरे को उजागर करने के लिए तो पर्याप्त है, लेकिन इसकी उम्मीद कम है कि वह आतंकवाद को संरक्षण देने की अपनी नीति का परित्याग करेगा। इसका संकेत एफएटीएफ के इस निष्कर्ष से तो मिला ही कि पाकिस्तान आतंकवाद के नासूर को समझने के लिए तैयार नहीं, इस संस्था की बैठक के एक दिन पहले आतंकी सरगना हाफिज सईद के संगठनों पर पाबंदी की दिखावटी कवायद से भी मिला था। पाकिस्तान ने यह कवायद दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही की थी। यह अच्छा हुआ कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेनकाब हुआ और ग्रे सूची से बाहर आने के उसके इरादों पर पानी फिरा, लेकिन और भी अच्छा होता कि उसे मोहलत देने के बजाय काली सूची में डाला जाता। यदि भारत की तमाम कोशिश के बावजूद ऐसा नहीं हो सका तो इसका कारण यही लगता है कि कुछ देशों ने पाकिस्तान की पैरवी की।
भारत को एफएटीएफ की अगली बैठक के लिए और तैयार करने के साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान को बच निकलने का कोई मैका न मिलने पाए। पाकिस्तान की और तगड़ी घेरेबंदी की जरूरत न केवल एफएटीएफ में है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भी। इससे एक सीमा तक ही संतुष्ट हूआ जा सकता है कि पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पुलवामा हमले की निंदा करते हुए पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया और फिर एफएटीएफ ने भी, क्योंकि यह तथ्य सामने आया कि चीन यह चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पुलवामा हमले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव में सीमा पार आतंकवाद शब्द का जिक्र न हो। चीन की इस चाहत के चलते यह प्रस्ताव करीब एक हफ्ते रुका रहा। पुलवामा हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना का बेशर्मी के साथ बचाव करने वाले चीन के प्रति भारत अपनी रीति-नीति बदले, यह समय की मांग है। चीन के भारत विरोधी रवैये की अनदेखी करते रहने का कोई औचित्य नहीं। अब जब यह साफ हो चुका है कि चीन भारतीय हितों को चोट पहुंचाने के लिए पाकिस्तान संरक्षित आतंकी ढांचे का बचाव करने में लगा हुआ है तब भारत को यह देखना ही होगा कि उसे दबाव में कैसे लाया जाए? यह सही समय है जब इस पर गहनता के साथ विचार हो कि हुआवे सरीखी उन चीनी कंपनीयों पर नकेल कैसे कसी जाए जिनसे दुनिया के अन्य देश सशंकित है। जय हिंद!