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SHAILESHKUMAR1654357
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मैने होश सभालते ही अपने परिवार को गरीबी से जुझते देखा। जब में मां की गर्भ में था, तभी मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी। तब मेरी जुडवा बड़ी बहनें बहुत छोटी थीं। पिता के न रहने के कारण मां पर खेती की देखभाल करने की जिम्मेदारी आ गई। लेकिन घर के साथ खेती का पूा काम संभालना उनके लिए बहुत कठिन था। कई बार जब हम फसल की कटाई के समय उनका हाथ नहीं बंटा पाते, तो परिवार को भारी नुकसान हो जाता था। थो़ॉा बड़ा होते ही मेने खेत में काम करना शुरु कर दिया। मैं उन तरीकों की खोज करने में लग गया जिससे मां का बोझ कुछ हल्का हो। दसवीं के बाद खेती के कारण मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा, लेकिन मैंने पार्ट टाइम पढ़ाई जारी रखी। मैं उन जुगाड़ों के बारे में सोचता, जिनसे मेहनत कम हो और उपज बढ़े। दरअसल हमारे यहां नीलगायों का उपद्रव बहुत ज्यादा था। उनसे फसल बचाने के लिए मेरी मां को रात में खेत में रुकना पड़ता था। नीलगाय चूकिं रोशनी से दूर भागती है, इसलिए मैंने तेल के एक कनस्तर के किनारों को काट दिया, उसके तल में थोड़ा पानी डाल दिया और उसके ऊपर तेल से भरा एक दीया जला दिया। इस कनस्तर को मैंने अपने खेत के बीचोबीच ऐसी जगह पर रखा, जहां से दूर-दूर तक रोशनी जाती हो। रात भर दीया जलता रहता इसलिए नीलगाएं हमारे खेत से दूर रहने लगी और मां को भी रात में खेंत पर रुकने की जरुरत नहीं रही। इसका एक औऱ लाभ यह हुआ कि उड़ने वाले कीड़े-पतंगें आग की तरफ आकर्षित होकर पानी में गिरकर मर जाते हैं, जिन्हें अगले दिन पक्षियां आपना आहार बनाती है। मेरी इस तरकीब को आसपास के अनेक किसानों ने अपनाया है। मैं युवा हुं और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता हूं। सोशल मीडिया पर खेतों से जुड़ी अनेक जानकारी मेंने हासिल की। दूसरे किसानों को इसके बारें में बताने के लिए मैंने आदर्श किसान सेंटर नाम से फेसबुक पेज शुरु किया, जिसे मैंने यु-टयूब पर भी डाला है। इन्हें मैं लगातार अपडेट करता हूं। इनमें मैंने अपना अनुभव साझा किया है कि लगातार एक ही फसल बोने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटती है, लिहाजा लग-अलग फसल बोनी चाहिए। खुद मैं कपास औऱ शकरकंद की खेती एक साथ करता हूं। ऐसे ही कपास के बाद मैं मूंग बोता हूं, जिसमें मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है। मैं रासायनिक खाद का इस्तेमाल अपने खेंत में नहीं करता हूं। रासायनिक खादों से केवल जमीनी की उर्वरा शक्ति पर नहीं, मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता हैं। मैं अपने खेत में ही ऑर्गेनिक खाद तैयार करता हूं।
अभी मैं बीस साल का हूं और अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता हूं। लेकिन मैं खेती करना चाहता हूं और जीवन भर किसानों की बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूं। अभी खेती से मुझे साल में चार से पांच लाख रुपये की आय होती है। आय बढ़ने के कारण पिछले साल में अपनी दोनों बहनों की शादी कर पाया। कभी मेरी मां की खेती के काम से फुरसत नहीं मिलती थी।आज स्थिति यह है कि कभी-कभी वह खेत पर आती हैं, तो मुझे किसानों को सलाह देते देख गर्वित हो जाती हैं। हालांकि मुझे इस बात का अफसोस है कि तकनीकी जानकारी न होने के कारण में खेती को उतना लाभप्रद नहीं बना पाया। इसके बावजूद में अपने युवा साथियों से यह कहना चाहता हूं कि खेती से मुंह मोड़ने के बजाय हमें खेती को लाभ का सौदा बनाना चाहिए।