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santoshsahu
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मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कुछ दिन पहले कहा कि सरकारी क्षेत्रों के बैंकों के संचालन में सुधार के लिए पी जे नायक समिति की अनुशंसाओं को लागू करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब तक इन सुधारों को संस्थागत रूप प्रदान नहीं किया जाता है, इस क्षेत्र में जोखिम बरकरार रहेगा। वह अपनी बात विनम्रतापूर्वक रख रहे थे।
मौजूदा भाजपानीत सरकार ने वादा किया था कि वह संचालन को बेहतर बनाएगी और जवाबदेही सुनिश्चित करेगी। इस सरकार के पांच वर्ष के शासन के बाद अब हम यह कह सकते हैं कि बैंकों के चेयरमैनों की अतीत की यह हालिया गड़बड़ियों, भारतीय रिजर्व बैंक की बैंकिंग निगरानी शाखा या वित्त मंत्रालय की निरंतर मजबूत होती बाबूशाही को लेकर कोई जवाबदेही सुनिश्चित करने का काम नहीं हुआ है। यही कारण है कि ऋण देने में होने वाले भ्रष्टाचार, बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान और बैंकों के पुनर्पूंजीकरण आदि को लेकर कुछ खास नहीं हो सका है। इस बीच भ्रष्ट और नाकारा बैंकों में जनता की अरबों रुपये की राशि निंरतर इस तंत्र को सुचारु रूप से चलाते रहने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। देश की आबादी तकरीबन 25 फीसदी अत्यधिक गरीबी में जीवन बिता रहा है।
सुब्रमण्यन के पले जो भी सीईए रहे, उनमें हमें इस कदर साफदिली देखने को नहीं मिला। सुब्रमण्यन ने यह भी कहा, केंद्र सरकार ने यह राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है कि सरकारी बैंक स्वायत्त ढंग से काम कर सकें और उनके वाणिज्यिक निर्णयों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो। परंतु हमें एक कदम पीछे हटकर हकीकत का आकलन भी करना चाहिए। यह सब राजनीतिक इच्छाशक्ति से संभव हुआ लेकिन अभी इसे संस्थागत रूप नहीं प्रदान किया जा सका है। कोई भी समझदार व्यक्ति जिसे इतिहास की जानकारी हो वह यह जानता है कि अगर किसी चीज को संस्थागत स्वरूप नहीं दिया जाता है तो उसका मोल भी कम होता है। हालांकि सुब्रमण्यन ने एकदम सही मुद्दा उठाया लेकिन वह भी तमाम अन्य शुभेच्छुओं की तरह सरकारी बैंकों से जुड़ा एक अहम मुद्दा उठाने से चूक गए।