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गरीबी हटाओ बनाम राष्ट्रवाद
राहुल आए, मुस्कराए, राहुल ने न्यूनतम आय योजना की घोषणा की, फिर पत्रकारों से कुछ इस तरह कहने लगे- आप चौंक गये न, न्यूनतम आय योजना एक धमाका है। ऐसी योजना पूरी दुनिया में कहीं भी नहीं हैं। हम पांच करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवारों को 6000 रूपये महीने देंगे। और इस तरह हम बची-खुची गरीबी को खत्म कर देंगे। एक टीवी चैनल ने इस योजना के राजनितिक आशय को तत्काल ताड़ा और पूछा कि क्या यह घोषणा भाजपा के “राष्ट्रावाद” के नैरेटिव की जगह ले सकती है। यानी राहुल का यह धमाका राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दे को बेकार कर सकता है? शायद इसी आशंका से विचलित होकर वित्त मंत्री जेटली ने इस घोषणा को धोखा कहकर इसकी हवा निलालने की कोशिश की और कांग्रेस के “गरीबी हटाने वाली पार्टी” पर हमला बोला कि कांग्रेस ने गरीबी हटाने के नाम पर गरीबी का वितरण ही किया है।
लेकिन ऐसी घोषणाओं को आज की जनता किस तरह लेती है? इस सवाल पर किसी ने विचार नहीं किया। अगर किया होता, तो मालूम पड़ता कि आज की जनता इस तरह की घोषणाओं को “चुनावी तिकड़म” मानती है। वह जानती है कि यह सब वोट लेने की चाल है। यानी कि आज की जनता सत्तर के दशक की जनता नहीं हैं, जो दानदाता का एहसान माना करती थी। अब वह ऐसे किसी भी एलान को चुनावी रिश्वत मानती है।
चुनाव घोषित होने के कुछ पहले मोदी ने “किसान सम्मान निधि” योजना के तहत गरीब किसानों को छह हज़ार रुपये प्रतिवर्ष देने की घोषणा की थी, तब उसे भी वोट लेने के लिए बांटी जाने वाली “खैरात” की तरह देखा गया था। हमारी गरीब जनता भी अब बेचारी नहीं रह गयी है। हमदर्दी शब्दकोश से बाहर का शब्द है। हमारे दल अपने-अपने विचारों के किलों में बंद रहते हैं। वे अब भी अपने को दाता समझते हैं। वे जनता को उसी तरह भूखी-नंगी समझते हैं, जिसको कुछ दे देगें, तो वह खुश हो जाएगी, जबकी आज की गरीब जनता में स्वाभिमान और अकड़ का एक नया मूल्य घर कर गया है कि अब वह आपकी उतरन नहीं पहनना चाहती और न आपकी जूठन खाना चाहती है। मोबाइल और सोशल मीडिया से सज्जित, इस अति बतकूटी दुनिया में इस जनता का नारा है- साडा हक इथ्थै रख।।