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MayankNotani
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अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों को अब पूरी ताकत से लागू करने का एलान करके भारत के लिए नई परेशानी और दुविधा खड़ी कर दी है। अमेरिकी घोषणा पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने काफी सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने भरोसा दिया है कि भारतीय तेल शोधक कारखानों को कच्चे तेल की समुचित सप्लाई दूसरे देशों से होती रहेगी। अमेरिका ने यह प्रतिबंध एकपक्षीय तौर पर लागू किया है और भारत ने हमेशा कहा है कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा लागू प्रतिबंधों को ही मानता है, लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने को भारत,चीन सहित अन्य देश इसलिए बाध्य हैं कि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेन-देन अमेरिकी बैंकिंग चैनलों के जरिए ही होते हैं और जो देश अमेरिकी प्रतिबंधों का आदर नहीं करेंगे, वे अमेरिकी बैंकिंग चैनलों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। इसका असर यह होगा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारी दिक्कतें होंगी, क्योंकि ज्यादातर व्यापार अमेरिकी डॉलर में ही होता है। यूरोपीय संघ ने अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए अपनी मुद्र यूरो के लिए एक नया वैकल्पिक बैंकिंग चैनल खोलने का एलान किया था, लेकिन वह अब तक चलन में नहीं आया है। यूरोपीय संघ ने पिछले साल ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया था और कहा था कि यूरोपीय कंपनियों को ईरान से लेन-देन करने की पूरी छूट होगी। लेकिन अब अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपने प्रतिबंधों में कुछ देशों के लिए दी गई छूट को वापस लेने के बाद यूरोपीय कंपनियों के लिए भी ईरान से लेन-देन करना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उनके सामने भी अमेरिका से रिश्ते बनाए रखने की मजबूरी है। प्रतिबंध का तर्क यह है कि ईरान अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे और इसके निरीक्षण की अनुमति अंतरराष्ट्रीय समुदाय, यानी अमेरिका को दे। इसके पहले अमेरिका ने ईरान की सेना रिवॉल्युशनरी गार्ड को आतंकवादी करार देकर अपना दवाब बढ़ाया था और ईरान ने इस पर काफी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालते ही ईरान के साथ अमेरिकी अगुवाई में छह देशों के परमाणु समझौते को रद्द करने का एलान किया था, हालांकि इसके मुे ख्य साझीदार यूरोपीय संघ ने इसका विरोध किया था। पर अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत के बल पर ईरान पर लगाए एकपक्षीय प्रतिबंध को इंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध में तब्दील करवाने में सफल हो गया, क्योंकि कोई देश अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम को नजरंदाज कर दूसरे देशों से व्यापारिक लेन-देन नहीं कर सकता।