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navinbairagi


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्‍यायाधीशों को इसलिए पंच परमेश्‍वर कहा जाता है, क्‍योंकि वे न्‍याय केवल करते ही नहीं, बल्कि करते हुए दिखते हैं। न्‍यायाधीश रंजन गंगोई ने सुप्रीम कोर्ट का मुख्‍य न्‍यायाधीश बनने के बाद कहा था कि मृत्‍दुदण्‍ड जैसे जरूरी मामलों पर ही त्‍वरित सुनवाई होनी चाहिए। लेकिन उन्‍होंने अपने मामले में, जिसमें एक महिला ने उन पर यौन उत्‍पीड़न का आरोप लगाया है, छुट्टी के दिन शनिवार को विशेष न्‍यायिक सुनवाई का फैसला किया। इसके चलते यह सवाल उठा कि उन्‍होंने महासचिव से स्‍पष्‍टीकरण दिलाने के बजाय उच्‍चतम न्‍यायालय के सभी न्‍यायाधीशों के यौन उत्‍पीड़न के आरोपों का सनसनीखेज मामला सामने आया। सबसे प्रमुख सवाल यही है कि जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर व्‍यक्तिगत सफाई देने के बजाय खुद ही सुनवाई करने का फैसला क्‍यों लिया। करीब एक साल पहले जस्टिस गोगोई समेत चार जजों ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके पूर्ववर्ती मुख्‍य न्‍यायाधीश दीपक मिश्रा पर मनमानी रवैये का आरोप लगाया था। उन आरोपों के तहत यह कहने की कोशिश की गई थी कि तत्‍कालीन मुख्‍य न्‍यायाधीश स्‍थापित न्‍याय प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं, पर सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा लगाये गए आरोपों को विधि द्वारा स्‍थापित प्रक्रिया से निपटाने के बजाय मुख्‍य न्‍यायाधीश ने अवकाश के दिन न्‍यायिक सुनवाई करके क्‍या संदेश देने की कोशिश की है। महिला के आरोप समाने आने पर आहत मुख्‍य न्‍यायाधीश ने कहा था कि इन घिनौने आरोपों के बाद अच्‍छे लोग जज बनना पसंद नहीं करेंगे। लेकिन यह बात तो अक्‍सर उठती है कि कुछ चुनिंदा परिवारों से जुड़े लोग न्‍यायापालिका पर हावी हैं। इसी तरह यह बात तो बहुत पुरानी है कि आखिर न्‍यायाधीश ही न्‍यायाधीशों की नियुक्ति कैसे कर देते हैं। यह भी ध्‍यान रहे कि देश में आज तक एक भी न्‍यायाधीश महाभियोग की प्रक्रिया के तहत हटाया नहीं जा सकता है। नेता, अफसर, सरकार और एनजीओ के भ्रष्‍टाचार से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्‍यायाधीश को लोकपाल बना दिया गया, पर न्‍यायाधीशों के गलत आचरण पर लगाम लगाने के लिए सक्षम शिकायत निवारण तंत्र भी नहीं बनाया गया है। आखिर ऐसा कब तक चलेगा।
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