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Raghvendra002
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कहा जाता है कि कोई भी नदी तभी संपूर्ण बनती है, जब वह अविरल बहती हो। यानी उसके कुदरती बहाव में कोई बाधा न आए, उस पर कोई बांध न बने, उसका पानी किसी जलाशय मे न जमा किया जाए, नहरें बना कर उसका पानी किसी जलाशय न जमा किया जाए, नहरें बना कर उसका पानी निकला न जाए, जल परिवाहन के लिए उसमें चैनल न बनाए जाएं और उसके बीच में ऐसी संरचनाएं न करी जाएं, जो उसकी धारा को रोकती हों। दुर्भाग्य से ऐसा बहुत कम होता है। विश्व के 34 नदी विशेषज्ञों ने पिछले दिनों दुनिया की उन सारी बड़ी नदियों का अध्ययन किया, जिनकी लंबाई 1000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसमें वे सारी नदियां हैं, जिन्हें न सिर्फ महान नदियों में गिना जाता है, बल्कि जिनके किनारों पर दुनिया की महान सभ्यताएं विकसित हुई हैं। जाहिर है कि इस फेहरिस्त में भारत की भी कई वे में पाया गया कि दुनिया की 37 प्रतिशत बड़ी नदियां अब अविरल नहीं हैं, उनके प्रवाह में किसी न किसी तरह की बाधा जरूर है। 37 प्रतिशत का यह आंकड़ा, अगर आप को चौंका रहा है, तो यह भी जान लीजिए कि भारत की कोई भी बड़ी नदी ऐसी नहीं है, जो अविरल हो। इस अध्ययन में जिन 37 प्रतिशत नदियों का जिक्र है, उन पर तमाम दूसरी बाधाओं के अलावा 28 लाख बांध बने हुए हैं और हजारों बांध अभी निर्माण की प्रक्रिया में हैं। नदी की अविरलता का खत्म होना कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। एक तो इससे नदी की वह भूमिका बाधित होती है, जो वह हमारी प्रकृति में निभाती है। इससे नदी का पूरा इको-सिस्टम आहत होता है। यह कई तरह क जलजीवों और नदी के आस-पास के पूरे क्षेत्र की जैव विविधाता पर भी बुरा असर डालता है। भारत में देखें तो महशीर जैसी कई तरह की महत्वपूर्ण मछलियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। यहां तक कि नदी के आस-पास रहने वाले और इस पर निर्भर लोगों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। अविरलता की बाधाएं ही हमें बाढ़ जैसी आपदाएं भी देती हैं।
नदियों से नहरों को निकाला जाना और इन पर बांधों का बनना करीब डेढ़ सदी पहले शुरू हो गया था। पिछली नदीं में तो यह काम करीब डेढ़ सदी पहले शुरू हो गया था। पिछली सदी में तो यह काम काफी तेजी से हुआ। भारत में तो शायद ही कोई ऐसी नदी बची हो, जिस पर बांध न बना हो या जिससे नहर न निकाली गई हो। बड़ी नदियों को तो छोड़िए, तमाम छोटी-छोटी नदियों पर बांध बनाए जा चुके हैं या बनाए जा रहे हैं। यह भी सच है कि इन बांधों ने हमारी बिजली की जरूरतों को पूरा किया है और उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की है, जिसे हम विकास कहते हैं। इन्हीं नदियों से निकली गई नहरों ने कृषि के विस्तार और हरित क्रांति में यानी देश के लोगों का पेट भरने में एक बडी भूमिका निभाई है। नदियों की अविरलता में बाधा की जो समस्याएं आज हमारे सामने हैं, उनके बारे में तब यह सोचा भी नहीं गया था, जब इन बाधों की योजनाएं बनी थीं। हम चाहें, तो इस स्थिति के लिए अपनी कुछ पिछली पीढ़ियों को कोस भी सकते हें, पर इससे कोई हल नहीं निकलेगा। फिलहाल हमारे पास जो बांध हैं, जो नहरें हैं, वह हमारे आज का सच है और हमें इसी से आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा। नदियों को भले ही हम फिर से अविरल न बना सकें।
मतदान वास्तव में लोकतंत्र का पर्यावाची नहीं है। थाईलैंड का उदाहरण देखिए, वर्ष 2014 में सेना ने फिर से तख्तापलट किया था, पर चूंकि सैन्य शासन को आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में सही नहीं माना जाता, इस वर्ष वहां चुनाव हुए। वादा था कि लोकतंत्र की वापसी होगी, पर वास्तव में सैन्य शासन को ही आगे चलाने की मंशा थी, सो सेना ने अपनी पार्टी गठित कर ली। संविधान के साथ धांधली की गई ताकि सेना समर्थित पार्टी को जिताया जा सके। वोटों को गणना के लिए 45 दिनों का समय लिया गया। विगत बुधवार को घोषणा की गई। परिणामों के आकलन के लिए विचित्र व विस्तृत फॉर्मूला आजमाया गया। जिस लोकतंत्र समर्थक नहीं पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है, उसके नेता को देशद्रोह समेत अनेक मामलों में आरोपी बना दिया गया। अंतत: तख्तापलट के नेता ही चुनावी जनादेश के मुखौटे के साथ प्रधानमंत्री के रूप में अपना पद बचाए, रखेंगे। दुनिया मे कई स्थानों पर नेताओं ने परिणाम को अपने पक्ष में करने के नए-पुराने तरीके अपनाए हैं। यूक्रेन में राष्ट्रपति चुनवा में मतपत्र पर नामक्रम में हाई प्रोफाइल राजनेता गलिया टिमोशेंको से पहले एक अन्य प्रत्याशी वाई वी टिमोशेंको का नाम दे दिया गया।