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Raghvendra002
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देश भर में डॉक्टरों की नाराजगी और कहीं-कहीं चिकित्सा सेवा का बाधित होना न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है। पश्चिम बंगाल के एनआरएस मेडिकल कॉलेज में दो डॉक्टर के साथ जिस तरह से एक मरीज के परिजनों ने मारपीट की थी, सरकार को तत्काल सक्रिय हो जाना चाहिए था। अफसोस, दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने और डॉक्टरों को समझाने की बजाय पश्चिम बंगाल की सरकार ने उन्हें धमकाने का रास्ता अख्तियार कर लिया। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कह दिया कि चार घंटे में ड्यूटी पर लौट आओ, वरना कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इससे बात और बिगड़ गई। जिस मेडिलकल कॉलेज में डॉक्टरों के साथ हिंसा हुई थी, वहां के प्रिंसिपल समेत अनेक वरिष्ठ डॉक्टरों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं। डॉक्टरों की निराशा और मामले की गंभीरता को एक आम आदमी भी समझ सकता है, लेकिन इसे पश्चिम बंगाल की सरकार समझने में चूक गई। नतीजा, केरल से दिल्ली और छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र तक डॉक्टर विरोध प्रदर्शन करते दिख रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत असर पड़ा है। खबर है कि अकेले पश्चिम बंगाल में चिकित्सा के अभाव में 20 के करीब मरीज जान गंवा चुके हैं।
हड़ताल का कथित राजनीतिक पहलू तो और भी अफसोस जनक व शर्मनाक है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जती से आहत ममता बनर्जी इस हड़ताल के लिए भाजपा और माकपा को न जाने किस आधार पर जिम्मेदार ठहरा रही हैं? विपक्षी पार्टी से हिंसक परिजन जुड़े थे या फिर हिंसा के शइकार डॉक्टर ? क्या यह कहना उचित है कि हड़ताली डॉक्टर बाहरी हैं? क्या यह कहना सही है कि सबने भाजपा को वोट दिए हैं, तो अभ भुगतो? डॉक्टरों से हिंसा और उनकी हड़ताल का सिलसिला पुराना है, लेकिन इश राजनीतिक चश्मे से देखना थोड़ी नई, और निंदनीय बात है। कोलकता हाईकोर्ट ने हड़ताल में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए राज्य सरकार को विवाद सुलझाने के लिए कहा है, तो कोई आश्चर्य नहीं। जब डॉक्टरों को समझाने के लिए कहा है, तो कोई आश्चर्य नहीं। जब डॉक्टरों को समझाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री समय निकाल सकते हैं, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को भी समय निकालना चाहिए, और हड़ताल को जल्द से जल्द खत्म करके अपनी योग्यता का पुन: परिचय देना चाहिए।
हड़ताल और उस पर निर्मम राजनीति से अलग डॉक्टरों के साथ हिंसा वाकई बहुत अमानवीय और उत्तरोत्तर बढ़ती समस्या है। बढ़ती आबादी, उभरती बीमारियां, अच्छी सेहत और चिकित्सा के लिए बढ़ती आकांक्षाओं से डॉक्टरों और अस्पतालों पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सा सेवा और सेवक, दोनों में कई कमियां हैं, जिनमें सुधार की कछुआ चाल से समाज में रोष भी है। इस कमियों को जानने वाले डॉक्टर अपने साथ हिंसा के करीब 91 प्रतिशत मामलों को नजरंदाज कर देते हैं और मात्र दो प्रतिशत मामलों में ही पुलिस रिपोर्ट दर्ज होती है। एक ओर, जहां सेवा के तमाम पक्षों में बुद्ध स्तर पर सुधार की जरूरत है, वहीं डॉक्टरों को किसी भी हिंसा को नजरंदाज नहीं करना चाहिए। लेकिन हिंसा के विरुद्ध तत्पर, जागृत और एकजुट हुए डॉक्टरों को सेवा गुणवत्ता में समग्र सुधार के लिए भी तत्पर , जागृत ओर एकजुट होना पड़ेगा, तबी वे मरीजों व उसके परिजनों की संतुष्टि और स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएंगे।
मार्च के महीने में दस लाख लोग इस मांग के साथ सड़कों पर उतरे थे कि ब्रेग्जिट पर अंतिम फैसले में मतदाताओं की ही सुनी जानी चाहिए। आने वाले समय में बी ब्रिटेन में क्षेत्रीय रैलियां होंगी और लंदन में शनिवार 12 अक्तूबर को सामूहिक पदयात्रा का आयोजन होगा। यह दिन काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सबसे खराब परिदृश्य अगर हुआ, तो उसके ठीक 19 दिन बाद बिना किसी सौदे या डील के ब्रिटिश लोकतांत्रिक आक्रोश को यूरोपीय सेवा से बाहर कर दिए जाने की संभावना है। और यह सब एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में होगा, जिसे टोरी लीडरशिप कंटेस्ट में 0.25 प्रतिशत मतदाताओं ने ही चुना है। ब्रेग्जिट के लिए जनादेश कहां है? करीब 60,000 कंजर्वेटिव बोरिस जॉनसन को वोट दे रहे हैं।