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Gyanendra_Soni
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ईरान ने जब अमेरिका के जासूसी ड्रोन विमान को मार गिराया तो लगा कि खाड़ी का क्षेत्र अब युद्ध की लपटों से नहीं बच सकेगा। लेकिन, अंतिम समय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर एक नियोजित हमला रोक दिया। हालांकि, अमेरिका ने ईरानी मिसाइलों को नियंत्रित करने वाली कंप्यूटर प्रणाली पर साइबर हमला जरूर किया। जाहिर है टेक्नोलॉजी के इस युग में विनाशकारी जमीनी संघर्षों के कई पर्याय हैं। आर्थिक प्रतिबंधों का एक पर्याय तो अमेरिका असरदार तरीके से अपना ही रहा है। लेकिन, ट्रम्प के अमेरिका के पास धैर्य नहीं है। वह तत्काल अपनी बात मनवाने में यकीन करता है। इसके साथ दुविधा उसका एक अलग चरित्र है। अमेरिका के पास धैर्य नहीं है। वह तत्काल अपनी बात मनवाने में यकीन करता है। इसके साथ दुविधा उसका एक अलग चरित्र है। अमेरिका में शांति केपक्षधर हैं तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन जैसे लोगों का एक पक्ष सैन्य कार्रवाई के लिए दबाव डाल रहा है। जहां ट्रम्प ने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा अन्य देशों से मिलकर ईरान के साथ किया समझौता तोड़ दिया, वही यह भी सही है कि राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार में उनका एक मूल मुद्दा अमेरिका को इराक व अफगानिस्तानके अंतहीन युद्धों से बाहर लाने का भी रहा है। ऐसे में यदि वे ही ईरान में संघर्ष छेड़ते हैं तो यह उनके लिए ठीक नहीं होगा। इसलिए ईरान को धमकाने के साथ वे शांति का संकेत भी देते हैं। उन्होंने ड्रोन के साथ उड़ रहे सैन्य विमान को निशाना न बनाने के लिए ईरान की सराहना इसीलिए की। इस विमान में तीस लोग सवार थे। उनके साथ दिक्कत यह है कि एक तरफ सऊदी अरब व इजरायल उन्हें ईरान के खिलाफ कड़ा रवैया अपनाने पर जोर देते हैं और ईरानी करार से बाहर आने में इन दोनों देशों का बड़ा हाथ रहा है, वहीं यूरोप के उसके सहयोगी सुलह-सफाई चाहते हैं। इस तरह असमंजस स्थितियों का है तो नीतियों का भी है। अमेरिका तीखे तेवर दिखाकर सैन्य कार्रवाई की धमकी देता है तो ईरान क्षेत्र में उसके सहयोगियों तक संघर्ष फैलाने का इरादा दिखाता है। इस तरह सवाल यही है कि पहले पलकें कौन झपकाता है। कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद ईरान इंतजार करने की स्थिति में है या शायद उसके सीमित विकल्पों में यही सबसे कारगर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे सहानुभूति दिलाने वाला है।