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देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार के वी सुब्रमण्यन ने अपनी पहली आर्थिक समीक्षा में सफलतापूर्वक पुरानी और सुविचारित अनुशंसाओं को एक नए और देसी रूप में प्रस्तुत किया है। सरकार को निजी निवेश पर ध्यान देना चाहिए, निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए और प्रशासनिक सुधार करना चाएि, सरसरी तौर पर देखें तो इन सुझावों में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है। परंतु समीक्षा ने इन नीतिगत निर्देशों को ताजगी प्रदान करते हुए उन्हें देश की हालिया आर्थिक सफलताओं से इस प्रकार जोड़ा है कि वह राजनीतिक नीति निर्माताओं को प्रेरित करेगी। इसके अलावा उन्होंने इन व्यापक अनुशंसाओं को पारंपरिक वृद्धि नीतियों के साथ सुसंगत बनाया है जबकि देश और विदेश में तमाम लोग औद्योगिक नीति वाले दिनों की वापसी की वकालत कर रहे हैं।
समीक्षा ने उस सामान्य समझ को भी चुनौती दी है जिसमें माना जाता है कि भारत को निवेश और निजी निवेश को केंद्र में रखते हुए खपत आधारित वृद्धि पर भरोसा करना चाहिए। यही कारण है कि उनकी नीति को निर्यात वृद्धि पर भी ध्यान देना चाहिए। यह उस बढ़ते संरक्षणवाद के विरुद्ध है जो सरकार के कुछ हालिया कदमों में नजर आता है। तयशुदा निजी निवेश को सन 2000 के दशक के मध्य जैसी ऊंचाइयों पर ले जाए बिना स्थायी उच्च वृद्धि दर का हासिल होना मुश्किल है। बहरहाल, इसका प्रबंधन आसान नहीं। निवेश में इजाफे की भरपाई बचत में इजाफे से करनी होगी, वरना चालू खाते का घाटा एक बार फिर बढ़ेगा। परंतु हाल के वर्षों में निजी कॉर्पोरेट जगत ने अनिवार्य तौर पर अपने आंतरिक बचत-निवेश के अंतर को समाप्त किया है। ऐसे में अर्थव्यवस्था में विशुद्ध बचतकर्ता आम परिवार हैं जो छोटे और असंगठित कारोबार चलाते हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र की विशुद्ध उधारी जिसमें केंद्र और राज्यों की बजट और बजट से इतर उधारी शामिल है, उसमें 2011-12 से औसतन 10 फीसदी की दर से इजाफा हुआ। ऐसे में निजी निवेश के लिए सरकार को कम व्यय और अधिक राजस्व की स्थिति लानी होगी। समीक्षा में इसका उल्लेख करके दलील और मजबूत की जा सकती थी। निजी निवेश के इस संकट की वजह को समझने का प्रयास करें तो समझ आता है कि सुब्रमण्यन ने समीक्षा में यह विषय क्यों छुआ।