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ाकिस्तान के सिंध सूबे में जिला है खैरपुर मीर। इसी के एक गांव में 2 मार्च, 1970 को गुलाम सगरा सोलंगी पैदा हुईं। पिता मुहीब अली गांव के ही सरकारी स्कूल मे मास्टर थे। सगरा पढ़ना चाहती थीं। मगर अफसोस, जहालत में डूबे उस गांव की रवायतों में लड़कियों की तालीम शामिल थी। जब कभी वह अपने वालिद के लिए दोपहर का खाना लेकर स्कूल पहुंचतीं, तो हुलसकर खिड़कियों से झांकती कि आखिर कलासरूम मे क्या होता है। वह रह-रहकर अपने पिता और भाइयों से कहतीं कि मुझे भी स्कूल जाना है, मगर खानदान के मर्द-औरतें कभी फुसलाकर, तो कभी डराकर सगरा की इस छाहत पर पानी डलते रहे। जाहिर है, घरदारी की बारकियों को जानने-समझने में ही सगरा का मासूम बचपन बीत गया। जिस उम्र में बच्चियां अपने गुड्डे-गुड़ियों की बारात सजाती हैं, सगरा की बारात उनकी दहलीज पर खड़ी थी। महल 12 साल की उम्र में उनका जबरन निकाह करा दिया गया और ताकीद की गई कि यह हमारे मुआसरे का दस्तूर है। इससे वह इनकार नहीं कर सकतीं। 12 साल की बेबस बच्ची रुखसत कर दी गी। फिर तो उनके साथ जुल्म ही होना था। सगरा के पित की ज्दतियां दिनोंदिन बढ़ती गईं। बात-बेबात जाहिल, बदसूत और बेशऊर होने के ताने और मारपीट उनकी तकदीर का हिस्सा बन चुके थे। उनकी समझ में कुछ नहं रहा था कि उनके साथ क्या हो रहा? जब तक वह होशमंद हो पातीं, दो बच्चों की मां बन चुकी थी। सगरा ने अपनी बदनसीबी से समझौता कर लिया था। वह पति के हुक्म की पूरी पाबंद थीं। मगर जिंदगी के बड़े इम्तिहान अभी बाकी थे। महज 20 साल की उम्र में पति ने उन्हें तलाक दे दिया। जिस समाज में 12 साल की मासूम के ख्वाबों की कोई कद्र हो, उसे इनते बाशऊर होने की उम्मीद भी सगरा क्या करती कि वह उन्हें संभाल लेगा। ऐसे समाजों में, पति के घर से निकाली गई रतों को हमदर्दी नहीं, हिकारत की निगाहों से देखा जाता है। सगरा इस बेइज्जती को ओढ़े अपने वालिद के घर गईं। गांव की वह पहली ब्यहता थीं, जिनको उसके पति ने तलाक दे दिया था। ऐसे में, पिता के घर भी वह उपेक्षित और अपमानित होती रहीं। कीबार ख्याल आया कि इस जिल्लत भरी जिंदगी से छुटकारा पा लें, मगर चार मासूम आंखें हर बार उन्हें इस गुनाह से बचाती रहीं। सगरा ने जिंदगी से कुछ इरादे बांधे। उनह्ने एक बार फिर अपने भाइयों से इल्तिजा की कि वे उनको पढ़ने दें। भाई भड़क उठे। एक ने तो उन पर हाथ भी उठा दिया। मगर सगरा को अपने बच्चों का मुस्तबिल संवारने के साथ-साथ अपनी जिंदगी को एक मुकाम देना था। वह छिप-छिपकर खुद ही पढ़ने लगीं। अपने बच्चों से कहा कि स्कूल में जो कुछ वे पढ़कर आते हैं, उनको भी सिखाया करें। आखिरकार एक भाई का दिल पसीज उठा। उसने उन्हें पढ़ने की इजाजत दे दी। चार साल के भीतर सगरा ने दसवीं की परीक्षा पास कर ली। गांव में खुले नए गर्ल्स स्कूल में मिली नौकरी ने उसके आत्मविश्वास को ऊंचा कर दिया था। 31 साल उम्र में उन्होंने ‘प्राइवेट स्टूडेंट’ के तौर पर बीए की डिग्री हासिल कर ली। अब एक नई मंजिल तय करने का वक्त था। सगरा ने फैसला किया कि गांव की बेटियों और औरतों को जहालत के अंधेरे से आजादी दिलाएंगी। एक भुक्तभोगी के रूप में वह जान चुकी थीं कि इन औरतों को आईन से मिले हुकूक के बारे में कोई जानकारी नहीं है। सगरा घर-घर जाकर मां-बाप को समझाने लगीं कि वे अपनी बेटियों के भविष्य से खिलवाड़ करें, उन्हें स्कूल भेजें, तालीम दिलवाएं। साल 1994 में सगरा ने ‘मारवी रूरल डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन’ (एसआरडीओ) नाम से एक गैर-लाभकारी इदारे की शुरुआत की। इसके जरिए वह पिछड़े इलाकों के गांवों में कार्यशालाएं जलसे करतीं और लोगों को तालीम की अहमियत बतातीं। साल 1999 में उन्हें अशोका फाउंडेशन ने फेलोशिप के लिए चुना और उनके संगठन में निवेश भी किया।
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