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vivekssc48


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ारत समेत एशिया भर में औद्योगिक उत्पादन में मंदी की खबरों के बीच हमारे यहां बुधवार को राष्ट्रीय हड़ताल सकारात्मक संदेश हरगिज नहीं देती। 10 प्रमुख ट्रेड यूनियनों की इस हड़ताल की आकलन और दावे हो सकते हैं, लेकिन असल मुद्दा इसका औचित्य होना चाहिए। हड़ताल के औचित्य के प्रश्न पर भी सिर्फ इसका आह्वान करने वाले श्रमिक संगठनों और सरकार की सोच में विरोधाभास है, बल्कि अंतिम क्षणों में कुछ श्रमिक संगठनों ने इससे किनारा भी कर लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के करीबी भारतीय मजदूर संघ और नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस द्वारा इस हड़ताल से किनार करने के राजनीतिक कारण भी तलाशे जा सकते हैं। केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का भी यही कहना है कि राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन समेत ज्यादातर मांगों पर सहमति बन चुकी है, इसलिए हड़ताल औचित्यहीन है; लेकिल श्रमिकों और उद्योगों, दोनों की चिंताओं को समझना जरूरी है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में श्रम कानूनों में सुधार का दबाव लगातार बढ़ रहा हैस जिसे श्रमिक अपने हितों के लिए खतरे के रूप में देखते हैं। उनका भय पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन इतना आतंकित होने की भी जरूरत नहीं है। समया का तकाजा है कि सिर्फ सरकार, बल्कि श्रमिक संगठन भी व्यावहारिक रुख अपनायें। मसलन हड़ताल करने वाले श्रमिक संगठनों की मुख्य मांगें हैं कि प्रस्तावित श्रमिक विरोधी संशोधन वापस लिये जायें, सार्वजनिक वेतन बढ़ा कर 15 हजार रुपये किया जाये। जाहिर है, जब अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निवेश आमंत्रित करना पड़ रहा है तो भारी-भरकम निवेश वाले उद्योगों को बेहतर रिर्टन और सुरक्षित भविष्य के अनुकूल नियम-कानून भी बनाने पडेंगे। इसका अर्थ श्रमिक हितों को ताक पर रख देना नहीं हो सकता, लेकिन श्रमिकों को अब अपने हितों के साथ-साथ उद्योगों के हितों की चिंता भी करना पड़ेगी। सह अस्तित्व का महत्व समझना और स्वीकार करना पड़ेगा। लगातार घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रम पूरी अर्थव्यवस्था के लिए ही सफेद हाथी बन गये हैं। बेशक इसके लिए सरकार औऱ राजनीति ज्यादा जिम्मेदार है, लेकिन चंद लोगों का रोजगार बनाये रखने के लिए करदाताओं की मेहनत की कमाई पानी की तरह इन पर नहीं बहायी जानी चाहिए। बंद होने से पहल विनिवेश या निजीकरण के जरिये इनको बचाने की कोशिश गलत नहीं है। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन का निर्धारण जटिल प्रक्रिया है। सुप्रीम कोर्ट और इंटरनेशनल लेबर कान्फ्रेंस के मानकों के आधार पर होने वाले इस निर्धारण में विभिन्न राज्यों में अलग-अलग न्यूनतम वेतन को भी ध्यान रखना होगा। इसके लिए कानूनी संशोधन जरूरी होगा, पर सरकार ने इस मांग को भी सिद्धांततः स्वीकार कर लिया है। इसलिए यह हड़ताल टल भी सकती थी, लेकिन अब कोशिश होनी चाहिए कि फिर ऐसी नौबत आये।
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