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poojarana
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विडंबना और शायद त्रासदी यह है कि हमारे देश के सबसे खूबसूरत हिस्से संघर्ष और हिंसा से सबसे ज्यादा ग्रस्त हैं। इसमें कश्मीर घाटी, मध्य भारत (विशेषकर बस्तर) के जंगल, और पूर्वोत्र के राज्य शामिल हैं। मानवशास्त्री वेरियर एल्विन की धारा का अनुकरण करते हुए 1990 दे दशक में मैंने पूर्वोत्तर का दौरा किया था। एल्विन इंग्लैंड में जन्में और पढ़े-लिखे थे, युवा वय में भारत आए, तो फिर नहीं लौटे। 1930 और 1940 के दशक मे उन्होंने मध्य भारत के आदिवासियों के साथ काम किया और उन पर लिखा। वर्ष 1954 में, तब तक यह भारतीय नागिरक बन चुके थे, आदिवासी मामलों में सरकार का सलाहकार के रूप में शिलांग आ गए। 1964 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी पत्न और बच्चे वहीं शिलांग में ही रह गए, जहां उनसे मेरी भेंट हुई थी।
एल्विन से जुड़ाव ने पूर्वत्तर के प्रति जो रुचि पदा की, वह बरकरार रही। आजादी के सात दशकों में पूर्वोत्तर ने दो तरह के संघर्ष देखे हैं। पहला, विद्रोहियों और भारतीय राज्य के बीच संघर्ष, जैसे नगा व मिजो विद्रोही और असम में उल्फा की गतिविधियां। दूसरा, क्षेत्र के अंदर ही रहने वाले भिन्न-भिन्न समुदायों या जातीय समूहों के बीच संघर्ष। विद्वानों और लेखकों ने अब तक पहले किस्म के संघर्ष पर ही ज्यादा फोकस किया है, क्योंकि ये संघर्ष राज्य की सुरक्षा और स्थायित्व से सीधे टकराते हैं। दूसरी तरह के उन संघर्ष पर कम ध्यान गया है, जिना यहां के रोजमर्रा के अनुभवों से गहरा सरोकार है। शायद स्थितियां अब बदल रही हैं। मैंने हाल ही में इस पूरे क्षेत्र के लेखकों के लेखों का प्रीति गिल और सम्राट द्वारा संपादित संग्रह देखा है- इनसाइडर आउटसाइडर : बीलॉन्गिंग ऐंड अनबीलॉगिन्ग इन नाऱ्त-ईस्ट इंडिया। पुस्तक का परिचय एक केंद्रीय विरोधाभास प्रस्तुत करता है। जो समुदाय भारत और पूर्वोत्तर भारत के आस-पास के देशों में बहुसंख्यक हैं, वे इस क्षेत्र में बहुधा अल्पसंख्यकों की तरह रहते हैं। साथ ही, स्थानीय समुदायों में यह भय है कि प्रवासी उन पर हावी हो जाएंगे। पुतक में शआमिल कुछ बेहतरनी लेख शिलांग शहर पर केंद्रित हैं। वेरियर एल्विन 1950 के दशक मे जब मध्य भारत में शिलांग आए थए, तब उन्होंने इसे कमाराती पाया था, इसके देवदार के वन और जानदार मौसम से उन्हें आल्पस की याद हो आई थी। उन्होंने इंग्लैंड में रहने वाली अपनी मां को लिखा- काश, हम हमेसा यहां रह पाते। हवा शानदार है, स्विस हवा की तरह, और शायद यह मेरे जीवन में दस वर्ष जोड़ देगी।
आज भी वहां पर मौसम वैसा ही रहता है, लेकिन शिलांग बदल गया है। वह बड़ा, बदसूरत और ज्यादा बेलगाम हो गया है; कथित भीतरी व कथित बाहरी के बीच गहरी और व्यापक गलतियों के साथ। उपन्यासकार अंजुम हसन के उत्तर भारतीय अभिभावक 1970 के दशक में पढ़ाने के लिए शिलांग आए थे। इस किताब में हसन ने अपने बचपन मे कथित बाहरियों के खिलाफ देखे दंगे को याद किया है। प्रवासियों के इस परिवार के पड़ोस तक दंगा फैल गया ता। कैसे दर्जनों आदमी दरांती, चाकू, मांस काटने वाला औजार और अपने अन्य हथियारों को लहराते हुए घर के बाहर बगीचे से गुजरे थे। हम बाथरूम में छिपे थे। बच्चे रो रहे हैं, इधर-उधर भाग रहे हैं, अभिभावकों के होंठ सिले हैं। लोग हमारे चारों ओर दौड़ रहे हैं, दरवाजा पीट रहे हैं, अपशब्द कह रहे हैं। ऐसे में, बाथरूम खोलकर सुरक्षित जगह पर पहुंचने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता।
शिलांग पर एक अन्य अच्छा लेख इतिहासकार बिनायक दत्ता ने लिखा है, जो व्यक्तिगत नहीं, विश्लेषणात्मक है। यह लेख बताता है कि यह शहर प्रवासियों, बंगालियों, गोरखाओं, मारवाड़ियों, सिखों इत्यादि के आगमन से कैसे बसा। और आने वाले