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annumathur
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धर्म के ठेकेदारों और समाज की तार्किक सोच का द्वंद्व शाश्वत है, क्योंकि कुछ धार्मिक-सामाजिक व्यवस्थाएं सोच सापेक्ष होती हैं, जबकि समाज की सोच समय के साथ तार्किक होती जाती है। यह सभी धर्मों में होती है। तीन तलाक की व्यवस्था का वर्तमान स्वरूप न तो कुरआन-सम्मत है न ही मकबूल इस्लामिक स्कॉलरों द्वारा अनुमोदित। लिहाजा मोदी सरकार और देश की संसद ने यह जिम्मा लेकर समाज के मानवीय चिंतन पर एक बदनमा दाग हटाने का क्रांतिकारी उपक्रम किया है। 90 साल पुरानी एक घटना से आज की स्थिति का मुजाहरा करें। अगर आज तुम इस विधेयक का विरोध करते हो तो पूरा विश्व तुम पर हंसेगा इस इबारत वाली तख्ती हाथ में लिए, नारे लगाती सैकड़ों औरतें बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ धर्म के पोंगापंथी और कट्टर ठेकेदारों को जगा रही थीं। जगह थी सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली भवन का गेट। ये महिलाएं, जिनमें मुसलमान औरतें भी थीं। अखिल भारतीय महिला संगठनों के बैनर के तले सदियों पुरानी बाल विवाह की कुप्रथा के खिलाफ आंदोलन कर रही थीं। इसके पहले पांच साल से असेंबली के कट्टरपंथी सदस्य बाल विवाह की उम्र को मात्र 14 साल करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत और प्रगतिशील सोच वाले हिंदू नेताओं के प्रयासों को यह कहकर खारिज कर रहे थे कि इससे हिन्दू धर्म की मूल भावनाएं आहत होंगी। इन विरोधों को खारिज करते हुए अंग्रेजों ने सारदा एक्ट पास किया। आंकड़े बताते हैं कि हर साल 32 लाख औरतें प्रसव पीड़ा में मर जाती थीं, क्योंकि इस या 12 में उनका शरीर बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं होता था।