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Abhishekk
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अफगानिस्तान में मेलमिलाप की चर्चाएं तेज होने के साथ हिंसा की घटनाओं में भी तेजी देखने को मिली है। इससे पता चलता है कि वहां कितना कुछ दांव पर लगा हुआ है। अफगानिस्तान के लिए नियुक्त अमेरिका के विशेष दूत जालमे खलीलजाद 18 वर्षों से चला आ रहा हिंसा का दौर खत्म करने के लिए उपद्रवियों के साथ 1 सितंबर तक एक समझौता कराने की कोशिश में लगे हुए हैं। दरअसल अमेरिकी जनता अफगानिस्तान में जल्द शांति स्थापना की पक्षधर है और डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान में यह एक अहम वादा भी था।
अमेरिका और तालिबान के बीच पिदले साल अक्टूबर से अब तक सात दौर की सीधी बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत का बुनियादी मकसद अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की सुरक्षित वापसी के साथ ही तालिबान से यह गांरटी भी लेनी है कि अफगान धरती का इस्तेमाल विदेशी आतंकी नहीं करेंगे ताकि बाकी दुनिया के लिए कोई खतरा न पैदा हो। दोहा में संपन्न आठवें दौर की बातचीत को सबसे उपयोगी माना गया और कई महीनों के गतिरोध के बाद इस वार्ता में एक नई ऊर्जा नजर आई। अमेरिका का इस पर जोर रहा है कि वह एक समग्र शांति समझौते के पक्ष में है, न कि एक वापसी समझौता चाहता है। हालांकि उसके इस दावे को स्वीकार करने वाले लोग कम ही है।