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annumathur
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अमेरिका जिस तरह के प्रयासों में लगा हुआ है, उससे कया नहीं लगता कि वह इतिहास के किसी खेल को दोहराना चाहता है, जिसमें पाकिस्तान उसके मुख्य सिपहसालार की भूमिका में हो पिछले दिनों डोनाल्ड ट्रंप प्रेस को संबोधित करते समय जम्मू-कश्मीर तक पहुंच गए। पूरब में भारत तथा चीन और पश्चिम में फारस व मध्यसागरीय दुनिया के बीच एक जंक्शन के रूप में स्थापित अफगानिस्तान इतिहास का कई सदियों तक व्यापार के लिए क्रॉस रोड्स तमाम संस्कृतियों एवं पड़ोसियों के मीटिंग प्लेस के साथ-साथ प्रवास व आक्रमण के लिाहज से फोकल प्वाइंट रहा है। इस दृष्टि से तो अफगानिस्तान नियंत्रण धरोहर के रूप में तमाम दस्तावेज में दर्ज होना चाहिए, लेकिन आधुनिक इतिहास के बहुत से पन्ने इसे प्लेस ऑफ कॉन्फ्टिक्ट के रूप में पेश करते हैं। कारण यह है कि अफगानिस्तान औपनिवेशिककाल से शीतयुद्ध व शीतयुद्धोत्तर काल तक कभी सोवियत संघ, कभी अमेरिका और कभी चीन की चालों का शिकार होता रहा। फलत: उसकी मौलिक विशेषताएं नेपय में चली गई। सामने आया वर्तमान स्वरूप जहां आतंकवाद और ध्वंस के नीचे दबी मानवता कराह रही है।
इसे क्या माना जाए। नियंत्रण शक्तियों का डर्टी गेम या अफगानिस्तान की किस्मत इस समय अमेरिका जिस तरह के प्रयासों में लगा हुआ है, उससे क्या नहीं लगता कि वह इतिहास के किसी खेल को दोहराना चाहता है, जिसमें पाकिस्तान उसके मुख्य सिपहसालार की भूमिका में हो। पिछले दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जब अमेरिकी यात्रा पर गए तो दोनों राष्ट्रों के बीच बात होनी थी अफगानिस्तान पर लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रेस को संबोधित करते समय जम्मू-कश्मीर तक पहुंच गए, तभी समझ में आ गया था कि अमेरिका कोई नई चाल चलने की तैयारी में है क्योंकि ट्रंप ने यह सोची-समझी राणनीति के तहत कहा था। इस रणनीति के कुछ बिंदु इस प्रकार हो सकते हैं। प्रथम-ट्रंप संदेश तो नहीं देना चाह रहे हैं कि दक्षिण एशिया में अशांति और आतंकवाद की वजह जम्मू-कश्मीर मुद्दा है। द्वितीय-पाकिस्तान इस समय आर्थिक संकट से गुजर रहा है। इसलिए उसे अमेरिकी सिपहसालार बनाना आसान है बशत्रे उसका प्रिय मुद्दा उठा दिया जाए।