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arunmathur
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देश में ही नहीं विश्व मंचों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार देश को 2 अक्टूबर से प्लास्टिक-शून्य करने की प्रतिबद्धता जताई और उसे फिर मथुरा के अपने 1 सितंबर के भाषण में दोहराया। वे ऐसे नेता हैं, जिनकी बात देश सुनता ही नहीं, बल्कि काफी हद तक मानता भी है। लिहाजा समाज की भूमिका वाले परिवर्तन साकार करने में उनकी अपील कारगर होती है। स्वच्छ भारत एक उदाहरण है। प्लास्टिक का इस्तेमाल भारतीय समाज की आदत बन गया है, लेकिन जब यह लाया गया था तब वह सबसे बेहतरीन विकल्प था। किंतु आज यह अपील विकल्पहीनता में की जा रही है। सरकार के अधिकारी भी अभी यह नहीं बता सके हैं कि सरकारी उपक्रम या उनके परोक्ष निर्देश पर चलने वाली संस्थाएं, कैसे और किस समतुल्य मटेरियल और सुविधा से 'फाड़ो और फेंको' दूश के प्लास्टिक पैकेट अगले 22 दिनों में बदलेंगी और पानी की बोतलों का क्या विकल्प तैयार किया गया है। क्या राज्यों में मौजूद सरकारी-कोऑपरेटिव दुग्ध संस्थाएं वैकल्पिक पैकेजिंग व्यवस्था कर चुकी हैं। केन्द्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान की सदारत में हुई एक बैठक में प्लास्टिक उद्योग के लोगों ने कहा कि कुल उद्योग साढ़े सात लाख करोड़ रुपए का है और करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इससे जुड़े हैं।