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RajeshBelsare


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िछले कुछ हफ्तों ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय को एक तरह से संवैधानिक अदालत बना दिया है। मुख्‍य न्‍यायाधीश की अगुआई में पांच न्‍यायाधीशों का एक पीठ अदालत संख्‍या 1 में अयोध्‍या मामले पर सुनवाई कर रहा है और जल्‍दी ही इस पर फैसला आने की उम्‍मीद है। अगले महीने एक अन्‍य पीठ जम्‍मू-कश्‍मीर से संबंधित संविधान के अनुच्‍छेद 370 के प्रावधानों को खत्‍म किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। अगर इस तरह एक के बाद एक संवैधानिक रूप से संवेदनशील मामलों का निपटारा होता रहा हो तो सर्वोच्‍च न्‍यायालय की इमारत के गलियारों में पड़ी सैकड़ों अलमारियों में रखी फाइलें गायब हो जाएंगी। संवेदनशील मामलों पर सुनवाई में आई इस तेजी की वजह राजनीतिक माहौल हो सकता है लेकिन कुछ लोग यह इशारा भी करते हैं कि मुख्‍य न्‍यायाधीश नंबर में सेवानिवृत्‍त हो रहे हैं। जो भी कारण हो, भविष्‍य में संवैधानिक मामलों की छोटी सुनवाई ही आदर्श होनी चाहिए। अयोध्‍या मामले ने दिखा दिया है कि जटिल मामलों का तय समयसीमा के भीतर फैसला करना संभव है। इस मामले में आठ भाषाओं में मौजूद करीब 20,000 पृष्‍ठों का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। फिर भी इस मामले का दो महीने में पटाक्षेप हो जाएगा। इसके उलट केशवानंद भारती मामले में सात महीने का समय लगा और तीन न्‍यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में हरेक में चार महीने का समय लगा। अमेरिका के उच्‍चतम न्‍यायालय में हरेक पक्ष को केवल आधे घंटे का समय मिलता है और उसके बाद लाल बत्‍ती जलती है। मौजूदा न्‍यायाधीशों के पास कम्‍प्‍यूटर की सुविधा है और साथ ही तेजी से फैसला सुनाने के लिए प्रशिक्षुओं से भी मदद मिलती है। आने वाले दिनों में इसमें कृत्रिम मेधा का भी सहारा लिया जाएगा। सिद्घांत रूप में ही सही, सर्वोच्‍च न्‍यायालय में एक शोध प्रकोष्‍ठ भी है। इसलिए संवैधानिक मामलों में उतना समय नहीं लगना चाहिए जितना पुराने समय में लगता था। जब 1958 में सर्वोच्‍च न्‍यायालय को मौजूदा इमारत में हस्‍तांतरित किया गया था तो एक कक्ष में केवल आठ न्‍यायाधीश ही बैठा करते थे। वे संवैधानिक मामलों में बिना समय गंवाए फैसला देते थे। अब न्‍यायाधीशों के मंजूर पदों की संख्‍या बढ़कर 34 पहुंच चुकी है और उनमें से 30 न्‍यायाधीश 14 कक्षों में बैठते हैं। यह संविधान पीठ के कुछ पुराने मामलों को निपटाने का अभूतपूर्व मौका है। हालांकि यह काम कतई आसान नहीं है। 250 से अधिक संवैधानिक मामलों को पांच न्‍यायाधीशों के पीठों को सौंपा गया है। इनमें से कुछ 1992 से ही अंतिम सुनवाई के लिए तैयार हैं। इनमें बेहद जटिल सवाल जुड़े हैं जैसे 1975 में आपातकाल के दिनों में हुए संवैधानिक संशोधनों के बाद संपत्ति का अधिकार और औद्योगिक विवाद अधिनियम में उद्योग की परिभाषा। ग्‍यारह मामले सात न्‍यायाधीशों के पीठों के हवाले किए गए।
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