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arpit_shah
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हे अपनी कला के धनी,सड़कों के बेताज बादशाह! मैं तुम्हें पाती लिख रहा हूं। हालांकि अब पाती लिखने का चलन लगभग समाप्ति पर है, फिर भी मैं पुरानपंथी जो ठहरा। वैसे पाती लिखने मैं में महामूर्ख पंड़ित हूं, जो अपने समय में अपनी प्रेमिका को कोई पाती लिखने का साहस न जुटा सका। खैर, तुम कलाकारी के धनी हो। तुम महान हो, नेताओं की तरह गुणों की खान हो। तुम हाथों के जादुगर हो, छलिया हो। पलक झपकते ही किसी की पॉकेट उड़ा लेते हो। आजकल तुम्हारा झपटमारों के साथ कंप्टीशन चल रहा है, फिर भी तुम अपनी कर्तव्य-परायणता का परिचय देने हुए अपना कर्म करते जा रहे हो। कुछ का मानना है कि आजकल मूल्यों का संकट है, लेकिन खाली पेट मूल्य भी कोई अर्थ नहीं रखते। आजकल जो भरे पेट वाले भी मूल्यों की धज्जियां उड़ाने में गुरेज नही करते। तुम्हारी कद-काठी देखकर कोई भी रुपसी तुम्हें छैला भी कह दे। तुम प्यार–व्यार के चक्कर में कभी पड़े हो या नहीं, मैं नहीं जानता । मैं तो बस इतना ही जानता हूं कि एक बार तुमने मुझ फटीचर की जेब पर हाथ मारा था और मुझे आंतरिक आभास हुआ कि तुम बहुत पछताए होंगे। जिस प्रकार काटने वाले जूते का दर्द कोई पहनने वाला जानता है, वैसे ही फटीचर होने का दर्द कोई दूसरा फटीचर ही समझ सकता है। बाहर से सफेदपोश अंदर से फटीचर हो सकता है, तुमने कभी सोचा नहीं होगा। फिर भी भैया, मुहल्ले में मेरी नाक कटने से रह गई। अड़ोस-पड़ोस के कई महानुभावों की जेब अब तक कट चुकी थी और वे अपने आपको ‘कुछ’ समझने लगे थे। उन्होंने फेसबुक पर लिखकर अपना स्टेट्स भी ड़ाल दिया था, और उनके कुछ मित्रों ने वाह भी लिखा था। लेकिन मैं मोबाइल वगैरह के प्रयोग में अनाड़ी किस्म का जीव हूं, जो केवल इसे दूरभाष की तरह प्रयोग करना जानता है। तुम्हारे हुनर को देखकर कभी-कभी तुम्हारे कर- कमल चुमने को जी करता है। लेकिन तुम तो हवा के झोंके की तरह हो। कभी इधर तो कभी उधर डोलते रहते हो। भीड़-भाड़ तुम्हें पसंद है, क्योंकि शिकार करने में आसानी रहती है ओर तुम्हारी कला का विकास तेजी से होता है। कभी तुम सिनेमा घर के टिकट खरीदते समय फिल्म रसिकों के भीतर घुस जाते हो और अपनी हाथ सफाई का प्रदर्शन करते हो। कभी किसी राजनीतिक शोभा-यात्रा में उन्हीं की तरह टोपी पहनकर शामिल हो जाते हो और नेता की गिरह पर ही हाथ मार देते हो। समाजसेवा के नाम पर कथित कर्मठ, चरित्रवान, लाखों का चंदा बटोरने वालों पर भी तुम कैंची चला जाते हो, इसलिए तुम सच्चे कलाकार हो। मेरी सोच मे तो जेबकट, गुंड़े, मवाली, कथित रूप से समाज के प्रतिष्ठित नागरिक होते हैं। इन्हें पुलिस जनों के साथ प्रायः नेताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। कहते हैं कि हर खेल का एक अपना रगं और मजा होता है। इसकी अनुभूति केवल खेलने वालें को ही हो सकती है। तुम भी अपने खेल माहिर हो। आजकल तो अपनों से परदा रखने का चलन है , फिर भी उड़ती खबर यह सुनी है कि तुम डिग्रीधारी और सम्मानित जीविका पाने में नाकाम रहने पर इस फील्ड में उतरे हो। मुझे तुमसे पूर्ण सहानुभूति है और साथ में संतोष भी है कि इस गला-काट प्रतियोगिता के काल में एक सफल जेवकट हो!