words per minute
14
sunildwivedi
00:00
Speed
इस साल पांचवी बार सख्त कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने इक्कीस और आयकर अधिकारियों की नौकरी से छुट्टी कर दी। इससे यह साफ हो गया है कि भ्रष्ट अफसरों की अब खैर नहीं है। सरकारी विभागों को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की कवायद में अब तक पिच्यासी अधिकारियों की सेवा खत्म की जा चुकी है, जिनमें चौंसठ अधिकारी कर विभाग के हैं। ये सारे अधिकारी वे हैं जिनके खिलाफ घूसखोरी, जबरिया वसूली पद के दुरुपयोग आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने सहित भ्रष्टाचार के दूसरे संगीन मामले दर्ज हैं। यों तो सरकार का शायद ही कोई ऐसा महकमा होगा जहां भ्रष्टाचार न हो, लेकिन कर विभाग में भ्रष्टाचार सीधे-सीधे आम लोगों से जुड़ा है और कर संग्रह का जिम्मा संभालने वाले अधिकारी किस कदर लोगों को धमकाते हुए लूटते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। खासतौर से कारोबार करने वाले व्यापारी आयकर विभाग की लूट से आतंकित रहते हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले से अपने भाषण में कहा भी था कि कर विभाग में कुछ काली भेड़ें हैं जो अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करके ईमानदार करदाताओं को परेशान करती हैं। घूसखोर अधिकारी आयकरदाताओं को इस हद तक परेशान कर देते हैं कि कई बार तो लोग मौत को गले लगा लेते हैं। पांच महीने पहले कॉफी डे के मालिक वीजी सिद्धार्थ ने भी आयकर विभाग की प्रताड़ना से परेशान होकर खुशकुशी कर ली थी।
सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ भले कितने अभियान चला ले, लेकिन इसे जड़ से खत्म कर पाना बहुत ही दुष्कर काम है। ऐसा इसलिए है कि हमने भ्रष्टाचार को एक तरह से आत्मसात कर लिया है और मान बैठे हैं कि यह हमारे समाज, प्रशासन और सरकारों का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने इस साल भारत में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा सर्वे कराया था। इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि साल भर में इक्यावन फीसद लोगों को घूस देकर अपने काम करवाए। सबसे ज्यादा यानी छब्बीस फीसद लोगों को संपत्ति और भूमि संबंधी कामों के लिए घूस देनी पड़ी। बीस फीसद लोगों को पुलिस में पैसे खिलाने पड़े। इसी तरह नगर निगम, बिजली विभाग, जल विभाग, आरटीओ दफ्तर और अस्पताल ऐसे ठिकाने हैं जहां बिना लेन-देन के काम करा पाना संभव नहीं है और इन महकमों से आमजन का सीधा साबका पड़ता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में निचले स्तर पर किस कदर भ्रष्टाचार पसरा है और लोग पैसे देकर काम कराने को मजबूर होते हैं।
कहने को ज्यादातर सेवाएं ऑनलाइन कर दी गयी हैं और इसका मकसद भी यह है कि लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सके। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं हो पा रहा है। बड़ी समस्या यह है कि घूसखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए हमारे पास पुख्ता तंत्र का अभाव है। ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता कि ऐसे मामलों की शिकायतें कहां की जाएं।