words per minute
18
sonuSaini1353092
00:00
Speed
भारत में आर्थिक सुधारों का सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। लाइसेंस और नियमन बाधाओं में कमी, जीएसटी, यूपीआई, आधार, दिवालिया कानून तथा कार्पोरेट कर में कमी आदि कुछ ऐसे कदम हैं, जो हमें 5 खबर डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर आगे बढ़ाते हैं। परन्तु पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने, और चीन की प्रति व्यक्ति आय के निकट पहुंचने हेतु हमें भारत के दो करोड़ नौकरशाहों के लिए एक नए प्रकार की मानव पूंजी संबंधी व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता होगी।
समृद्धि के लिए उत्पादक फर्मों और श्रमिकों की जरूरत होती है। भारत की पूंजी श्रम के बिना विकलांग है, और श्रम पूंजी के बिना। इसका कारण लंबे-चौड़े नियमन और अनुपालन कानून, और प्रतिवर्ष इनमें होने वाले परिवर्तन हैं। निजी उद्यमों पर लगाए जाने वाले इन अवरोधों के पीछे नौकरशाही का दिमाग काम करता है। इनकी संस्कृति ही कुछ ऐसी बन गई है, जो कानूनों का लचर मसौदा बनाने, सुधारों को खारिज करना, सूक्ष्म व लघु उद्योगों के स्थान पर निजी क्षेत्र की कंपनियों को बड़ा बनाने की मानसिकता पर लगातार चली जा रही है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने लगभग देश की अथाह पूंजी का विनाश कर दिया है। इन सबमें परिवर्तन की आकांक्षा रखने वालों को सिविल सेवकों के लिए जलवायु परिवर्तन जैसा कुछ करने की आवश्यकता है।