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राजा भोज ने सोचा कि अब तो दो पुतलियाँ शेष रह गई है। उसके बाद उसे सिंहासन पर बैठने से कोई नहीं राेक सकता। इस प्रकार उसने आशा नहीं छोड़ी थी। अगले दिन वह जैसे ही आगे बढ़ा तो इकतीसवीं पुतली मानवती उसका रास्ता रोककर खड़ी हो गई। बोली, राजा भोज तुम्हारी हिम्मत की मैं प्रशंसा करती हूँ। मैं तो कामना करती हूँ कि तुम इस सिंहासन पर अवश्य बैठो पर क्या करूं तुमसे राजा विक्रम जैसा एक भी गुणा नहीं है। सुनो मैं तुम्हे एक कहानी सुनाती हूँ। एक समय की बात है। राजा विक्रमादित्य नदी किनारे आए। उन्होंने देखा कि तेज धाराओं में एक युवक और एक युवती बहते चले जा रहे हैं। शायद अपने प्राण बचाने, नदी किनारे लगने के लिए बेतरह हाथ पैर मार रहे थे, पर नदी की तेज लहरों के सामने उनकी एक न चल पा रही थी। राजा विक्रम बिना एक क्षण गँवाए नदी में कूद पड़े और दाेनों को खींचकर किनारे पर ले आए। राजा ने देखा, युवती बहुत सुंदर थी। शिख से नख तक उसका एक-एक अंग मानों साँचे में ढला हुआ हो। युवक ने राजा विक्रम को पहचाने बिना बतलाया, हम अपने परिवार के साथ नाव द्वारा यात्रा कर रहे थे। अचानक नाव भँवर में पड़ गई और हम सब धाराओं में फँस गए। आपने हमारी सहायता की है। आपके हम बहुत आभारी है। युवती भी श्रद्धा और सम्मान के साथ राजा विक्रमादित्य को देख रही थी। विक्रम ने उस युवक से पूछा, तुम्हारा परिचय क्या हैं? तो वह बोला, मेरा नाम देवकांत है और यह मेरी बहिन देवकांता है। हम सारंगदेश के निवासी हैं। राजा विक्रम ने उन्हें उनके घर सकुशल पहुँचाने का आश्वासन दिया। जब देवकांत को पता चला कि उसको और उसकी बहिन को बचाने वाला और कोई नहीं विक्रमादित्य था तो उसका मन श्रद्धा से भर गया। राजमहल मे सारी सुविधाओं के साथ उन दोनों को ठहरा दिया गया। देवकांत अपनी बहिन के विवाह के लिए बहुत चिंतित था। अचानक उसके मन में आया कि क्यों न उसका विवाह राजा विक्रम से कर दिया जाए। अपने इसी विचार के कारण उसने राजा विक्रमादित्य के दर्शन करने की अनुमति प्राप्त कर ली। देवकांता को अपने साथ लेकर वह राजमहल में गया। देवकांता संपूर्ण श्रृंगार के साथ देवलोक की अप्सरा के समान लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि मानो धरती का सारा सौंदर्य उसमें आ गया हैं।