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नवाब पुर नामक गाँव में अधिकतर खेतिहर मजदूर ही रहते थे जिसमें अब्दुल चाचा नाम का एक किसान भी था। अब्दुल की शादी के दस वर्ष बाद उसके घर पुत्र हुआ जिसका नाम अकरम रखा गया। अब्दुल के परिवार में उसकी पत्नी शकीला और बेटा अकरम ही थे। अब्दुल दिन-रात मेहनत कर के अकरम को पाल रहा था। उसके पास थोड़ी जमीन थी। बैल भी बूढ़े और कमजोर थे। जमीन भी बंजर और पथरीली थी। अब अकरम पन्द्रह-सोलह वर्ष का युवक हो चुका था, मगर अब्दुल उसे कभी खेतों की तरफ नहीं जाने देता था। उसकी यही इच्छा थी कि बेटा खाये-पीये और मौज करे। उसे कभी कोई कष्ट न हो। अब्दुल की नजरों में वह अभी भी नन्हा-सा बच्चा था। कभी-कभी अकरम की माँ कहती-अकरम के बापू। क्यों दिन-रात खेतों में मेहनत करते रहते हो, अकेले कब तक काम करते रहोगे, अल्लाह के फजल से अब बेटा बड़ा हो गया है। उसे भी अपने साथ काम में क्यों नहीं लगाते, मदरसे से आने के बाद वह यार-दोस्तों के साथ मौज-मस्ती में लगा रहता है। अब्दुल कहता- अकरम की अम्मी, आखिर उसकी उम्र ही क्या, अभी, जो उसे खेतों में जोतू, अभी तो उसके खेलने-खाने के दिन हैं, भूल गई कि खुदा ने कितनी मिन्नतों खुशामदों के बाद हमें बेटा दिया उसे तो बस पढ़-लिख लेने दो ताकि बड़ा आदमी बन सके, खेती बाड़ी में क्या रखा है, उसे तो मै बड़ा अफसर बनाऊंगा-अफसर। हाँ-हाँ भले ही खुद काम करते-करते मर जाना, जरा अपना शरीर तो देखों, कितना कमजोर हो गया है, हड्डियाँ ही नजर आती है, समय से पहले बूढ़े दिखाई देने लगे हो। अरी भागवान, तू मेरी फिकर मत कर, मैं बूढ़ा हो रहा हूँ तो क्या हुआ, मेरा बेटा तो जवान हाेता जा रहा है। बस मेरे लिए इतना ही बहुत हैं। शान से सीना फुलाकर अब्दुल बोला-तू चिन्ता मत कर, अपना बेटा जब पढ़-लिखकर अफसर बन जाएगा तो हम दोनों चैन से बैठेगें, मुझे विश्वास है कि हमारा बेटा मरते दम तक कोई दु:ख नहीं होने देगा।