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ManojKumar1737407
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन अप्रिय कारणों से ही। विगत दिवस इस विश्वविद्यालय में चेहरा ढके लोगों ने छात्रों एवं शिक्षकों के साथ मारपीट करने के साथ जिस तरह तोड़फोड़ की उसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। किसी भी शैक्षिक संस्थान में ऐसी हिंसा होना बेहद शर्मनाक है। इससे खराब बात और कोई नहीं कि देश की राजधानी का एक नामी विश्वविद्यालय खौफनाक गुंडागर्दी का गवाह बने। दिल्ली पुलिस को न केवल नकाबधारी हिंसक तत्वों को बेनकाब करना होगा, बल्कि उन्हें शह देने वालों तक भी पहुंचना होगा। अगर हिंसा के लिए जिम्मेदार तत्वों पर शिंकजा नहीं कसा गया तो यह विश्वविद्यालय खूनी छात्र राजनीति का अखाड़ा ही बनेगा और अपनी रही-सही प्रतिष्ठा से भी हाथ धोएगा। हालांकि जेएनयू प्रारंभ से ही वामपंथी विचारधारा का गढ़ रहा है, लेकिन बीते कुछ समय से वहां वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर अराजक एवं असहिष्णु विचारधारा को भी पोषण मिल रहा है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जेएनयू में उन्हें विशेष संरक्षण मिलता है जो भारतीयता, राष्ट्रीयता आदि को हेय दृष्टि से देखने को तत्पर रहते हैं।
यह किसी से छिपी नहीं कि जेएनयू में कभी नक्सलियों का गुणगान होता है तो कभी आतंकियों का। इस तरह के ओछे आचरण को वैचारिक स्वतंत्रता के आवरण में ढकने की भी कोशिश होती है। इस कोशिश में कई राजनीतिक दल खुशी-खुशी इसलिए शामिल होते हैं, क्योंकि इससे ही उनका हित सधता है। ये वही दल हैं जो जेएनयू में रजिस्ट्रेशन के साथ पठन-पाठन को हिंसा के सहारे बाधित किए जाने पर तो मौन धारण किए रहे, लेकिन जैसे ही विश्वविद्यालय परिसर में नकाबपोशों के उत्पात की खबर मिली वैसे ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि यह सब कुछ सरकार के इशारे पर हुआ है। यह आरोप इसलिए गले नहीं उतरता, क्योंकि नागरिकता कानून के हिंसक विरोध से सरकार पहले ही परेशान है।