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ManojKumar1737407


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बार की बात है एक शहर में एक बहुत धनवान सेठ की दुकान थी जो शहर में सबसे अधिक चलती थी। उसकी दुकान पर हर तरह का सामान मिलता था इसलिए दुकान पर हर समय ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। उस दुकान पर एक छोटा सा व्‍यापारी सेठ को मक्‍खन सप्‍लाई करता था जो कि एक गोल पेढ़े के आकार का आता था और प्रत्‍येक पेढ़े का वजन एक किलोग्राम था। वह जितने पेढ़े सेठ को देता था उसके मूल्‍य के बदले घर की जरूरत में आने वाले सामान जैसे चीनी, चावल, दाल इत्‍यादि ले जाता था। यह सिलसिला वर्षों से चलता रहा था और दोनों एक दूसरे पर पूर्ण विश्‍वास रखते थे। एक दिन वह व्‍यापारी उस सेठ को मक्‍खन के पचास पेढ़े अर्थात पचास किलोग्राम मक्‍खन देकर गया। सेठ उस पेढ़ों को एक बड़े फ्रिज में रखता जा रहा था। पेढ़े रखते-रखते सेठ के मन में विचार आया कि क्‍यों एक पेढ़े का वजन जांच कर लिया जाये। सेठ ने एक पेढ़ा तराजू पर रखा तो उसका वजन 900 ग्राम निकला। सेठ ने दूसरे पेढ़े को तराजू पर रखा तो उसका वजन भी नौ सौ ग्राम निकला। सेठ को क्रोध गया और उसने सभी पेढ़ो का वजन करवाया। उसके आश्‍चर्य की सीमा ही रही जब सब पेढ़े 900 ग्राम के ही निकले। अब सेठ आपे से बाहर गया। उसने तुरन्‍त उस व्‍यापारी को बुलावा भेजा। व्‍यापारी आया तो सेठ ने उसे पेढ़ों का वजन करके दिखाया और खूब बुरा-भला कहा। उस व्‍यापारी को कहा गया कि वह ईमानदार नहीं है और उसमें बेईमानी कूट-कूट कर भरी हुई है। उसे यह पाठ भी पढ़ाया गया कि व्‍यापारी को ईमानदार होना चाहिए। छोटे व्‍यापारी ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से उत्‍तर दिया कि सेठ जी मैं एक बहुत छोटा व्‍यापारी हूं और मेरे पास बाट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदता था तो सामान का एक पैकेट जो कि 1 किलोग्राम का होता था, उसे तराजू के एक तरफ बाट के स्‍थान पर रखकर दूसरे स्‍थान पर उतने ही भार के अनुसार मक्‍खन को रखकर तौल कर एक पेढ़ा बनाता था जो आपकको सप्‍लाई करता था। सेठ को अपनी करनी समझ में गई। उसे अपने आप पर शर्म आने लगी थी। सेठ को सही-गलत का फर्क महसूस हो गया था। ज्ञानी लोग सही कहते हैं कि जीवन एक प्रतिध्‍वनि है जो हम अच्‍छा या बुरा इस संसार को कहते हैं कुछ समय बाद वही हमें प्रतिध्‍वनि के रूप में हमारे पास वापिस जाता है। सत्‍य ही है कि हम दूसरों के लिए जो अच्‍छा या बुरा सोचते या करते हैं, हू-ब-हू वही हमें किसी किसी तरह वापिस मिल ही जाता है।
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