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VinayTiwari9536
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अपने तमाम पड़ोसियों को यह सूचित करते हुए मुझे अपने मरने से भी अधिक दुख हो रहा है कि मैनें चार महीने पहले सस्ता होने के चलते जो पांच किलो प्याज खरीदा था, वह अब खत्म हो गया है। इसलिए अपने तमाम छोटे-बड़े पड़ोसियों को वैधानिक चेतावनी दी जाती है कि अब वे मेरे घर कृपया गलती से भी प्याज मांगने न आएं। मेरे घर में प्याज तो क्या, अब प्याज के छिलके भी नहीं बचे हैं। यह कड़ी वैधानिक चेतावनी देने के बावजूद अगर किसी भी पड़ोसी ने इसे गंभीरता से न लेते हुए अन्यथा लिया तो उसे मेरे घर प्याज मांगने आने पर खूब जलील होना पड़ेगा। उसकी सारी की सारी जिम्मेदीर प्याज मांगने आने वाले की होगी। मैं उसके लिए कतई जिम्मेदार नहीं होऊंगा। फिर मत कहना कि बंदे ने उसे जलील होने से पहले सावधान नहीं किया।
हे मेरे पड़ोसियों! मैं यह भलिभांति जानता हूं कि मैं महीने में पच्चीस दिन आपसे ही कुछ न कुछ मांग कर अपना पेट भरता रहा हूं। मैं आपसे रोज कुछ-न-कुछ इसलिए नहीं मांगता रहता हूं कि मुझमें कुछ खरीदने की शक्ति नहीं। मैं तो मांगने के बहाने हालचाल जानने पहुंचता हूं। मागंना तो बस एक माध्यम होता है। इस बहाने पता चल जाता है कि पड़ोस में कौन स्वस्थ चल रहा है और कौन अस्वस्थ। किसके घर क्या बवाल चल रहा है, पता तो होना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि मोहल्ले के बारे में आदमी का जनरल नॉलेज कभी कमजोर नहीं होना चाहिए। इसलिए की बुरा माने या भला, कुछ-न-कुछ एक-दूसरे से मांगते रहना आपसी मेलजोल की भावना को बढ़ाता है। जब हम किसी के दरवाजे पर कटोरा लिए कुछ मांगने खड़े होते हैं तो भले ही देने वाला गालियां ही दे, पर कड़वा सच तो यह है कि मांगनें में दीनता-हीनता के नहीं, भाईचारे के भाव छिपे होते हैं। ये मांगने के बाद और भी परिपक्व होते हैं। जो किसी से कुछ मांगता नहीं, सब कुछ अपने घर में जमा करके रखता है, वह समाज में रहने लायक नहीं। वह सामाजिक प्राणी नहीं। उसे क्या पता, मांगना हमारे सामाजिक संबंधों के उन्नयन में कितना सहायक होता है!
इसलिए हे मेरे अति समझदार पड़ोसियों, आपकी इज्जत आपके हाथ में है। मेरे घर पर हंसते हुए कुछ भी मांगने पूरी बेशर्मी से आइए पर प्लीज! इन दिनों प्याज मांगने गलती से भी न आइएगा। आशा है मेरे पड़ोसी प्याज की कीमतों से जन्मी शर्मिंदगी को ध्यान में रखते हुए न तो खुद शर्मिंदा होंगे और न ही मुझे शर्मिंदगी उठाने का अवसर देंगे।