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वीर व्यक्ति कभी भी कपटपूर्ण राजनीति में विश्वास नहीं करता है। इसके विपरीत दशा में जब व्यक्ति के हृदय से वीरता का भाव नष्ट हो जाता है और वह कायर बन जाता है, तब वह विजय प्राप्त करने के लिये कपटपूर्ण राजनीति की कुटिल चालें चतला है। उस समय उसकी गतिविधियों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कि उसके हृदय से वीरता भाग रही है और उसके भागने में राजनीति की कपटपूर्ण व्यवहार-रूपी धूल उड़ रही है। तात्पर्य यह है कि वीरता का भाव नष्ट होते ही व्यक्ति की संघर्ष -क्षमता समाप्त हो जाती है और वह किसी भी प्रकार से विजय पाने के लिये आतुर हो उठता है। ऐसी स्थिति में वह सत्य और न्याय की राजनीति के लिये महाभारत के दुर्योधन ने जब देखा कि पाण्डवों को जीतना कठिन है तो उसने अपने मामा शकुनि, भाई दू:शासन और मित्र कर्ण के सहयोग से कपट की राजनीति का जाल फैला कर विजयश्री पाने का भरसक प्रयास किया । उसकी धूत क्रीड़ा लाक्षागृह का निमार्ण अभिमन्यु पर कई योद्धा का एक साथ आक्रमण आदि ऐसी ही घटनाएं हैं जो उसकी कपटपूर्ण राजनीति के जीवन्त उदाहरण है