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अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी ने जाने-अनजाने ऐसे समुद्र-मंथन की शुरुआत कर दी है, जो विष और अमृत, एक साथ उगलेगा। ऐसा कहने का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम एक ऐसे अनूठे वक्त में रह रहे हैं, जहां तथ्य और कथ्य के बीच के तंतु नदारद हैं। आजकल आभासी कथानकों को तथ्य का जामा पहनाने की कोशिश की जाती है। इससे समाचार और कहानी का फर्क गड्ड-मड्ड हो गया है। मीडिया खुद इस भेड़चाल का हिस्सा बन गया है। इसके कुछ स्वघोषित प्रवक्ताओं ने सच के नाम पर खबर, विचार और अवधारणाओं के आवश्यक विभेद को भेद दिया है। टीवी स्क्रीन पर चीखते चेहरे अपने गढ़े हुए प्रतिमानों को बेहद आक्रामकता के साथ पेश करते हैं, ताकि उनका कहा हुआ आम आदमी के मानस पर छप जाए। यही वजह है कि पत्रकारिता के खरे सिक्कों को इस समय अपनी ही टकसाल के खोटे सिक्को से जूझना पड़ रहा है। कोई हैरत नहीं कि पश्चिमी समाज विज्ञानी इस कुम्हलाए कालखंड को उत्तर सत्य युग का दर्जा देते हैं। बहुत दूर जाए बिना अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला लेते हैं। पहले कुछ सवाल उठाए गए। यह एक तरह से लंबे कथानक की भूमिका का रचा जाना था। फिर बिहार में एक एफआईआर दर्ज कराने के बाद मामला सीबीआई के हवाले कर दिया गया। नई दिल्ली में सीबीआई के प्रवक्ता इस मसले पर कोई फैसलाकुन बयान नहीं दे रहे थे, पर कुछ टीवी चैनल वादी, वकील और मुंसिफ की भूमिका एक साथ निभाने में जुटे थे। पुरानी कहावत है, रेत पर उकेरी गई तस्वीरों की उम्र लंबी नहीं होती। हत्या की इस थ्योरी के साथ यही हुआ। यहां से इस कथानक का दूसरा अध्याय शुरू हुआ और रिया चक्रवर्ती को खलनायिका बनाने की कोशिश की गई। देश की दो अन्य आला एजेंसियां इन आरोपों की तफ्तीश में जुटीं। वे भी चुप थीं, पर टेलीविजन हर रोज नए संधान कर रहा था। कभी मामला धनशोधन का बताया जाता, तो कभी ड्रग्स का। देखते-देखते ठाकरे परिवार सहित सिने उद्योग के सबसे चमकते लोग उसकी गिरफ्त में आ गए। ऐसा लगा, जैसे समूचा बॉलीवुड नशेड़ी है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब इस दुष्प्रचार से हकबकाए अग्रणी फिल्म निर्माता, अभिनेता दिल्ली हाईकोर्ट की शरण में पहुंचे। उनकी इल्तिजा थी कि बराए मेहरबानी इन टीवी चैनलों को हमारी प्रतिष्ठा धूमिल करने से रोकें। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि जिन चैनलों को लेकर यह गुहार लगाई गई थी, उनमें से एक रिपब्लिक भी है। अर्णब गोस्वामी इसके प्रधान संपादक हैं और कंपनी के मालिकों में से एक भी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अर्णब और उनके जैसे कुछ अन्य लोगों ने भारतीय पत्रकारिता में एक खास किस्म का प्रयोग किया। यह स्थापित मानदंडों के न केवल प्रतिकूल था, बल्कि बहुतों को आहत करने वाला भी था।