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अर्णब गोस्वामी अपनी बात को जायज ठहराने के लिए वह यह भी फरमाते थे कि मेरे चैनल की टीआरपी इसीलिए सबसे आगे है, क्योंकि लोग उसे पसंद करते हैं। यही वजह है कि मुंबई पुलिस ने जब टीआरपी में हेराफेरी के आरोप में कुछ लोगों को गिरफ्तार किया, तब उन्होंने चीख-चीखकर कहा कि यह एक सियासी षड़यंत्र है। कुछ मीडिया घरानों के प्रधान संपादकों/संचालकों के नाम ले-लेकर उन्होंने चुनौतियों की मिसाइलें दागीं। वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और मुंबई के पुलिस कमिश्नर का नाम लेकर आरोप-वर्षा कर दी। पत्रकारिता में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, पर वह बेपरवाह बने रहे। उनकी इसी अदा ने भारतीय पत्रकारिता को इस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां हर राह चलता हम पर अंगुली उठा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी गिरफ्तारी ने समूचे मीडिया जगत को वैचारिक समुद्र-मंथन की राह पर धकेल दिया है। कुछ लोग इसे उद्धव ठाकरे सरकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करार दे रहे हैं, तो कुछ इसे आपराधिक मामला बताते हुए अभिव्यक्ति के सरोकारों से इसका नाता जोड़ने के खिलाफ हैं। स्वाभाविक रूप से शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने इससे इनकार किया है, पर हंगामा जारी है। अर्णब के समर्थन में जो लोग आज महाराष्ट्र में अघोषित आपातकाल के आरोप लगा रहे हैं, वे देश के अन्य राज्यों में पत्रकारों के ऊपर हो रहे हमलों पर चुप रहे हैं। ऐसा क्यों?
यह एक तल्,ख हकीकत है कि सत्ता-सदनों में बैठने वाले लोग मीडिया के प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं। सरकार किसी भी दल की हो, पर सच बोलना-लिखना आसान नहीं रह बचा है। पिछले वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए, पर उनमें अधिकतर आंचलिक पत्रकार थे। उन पर संगीन धाराएं थोपने वालों ने जो किया, उससे कहीं अधिक त्रासद मीडिया संगठनों की चुप्पी है। क्या न्याय और अन्याय पर सिर्फ कुछ सेलिब्रिटी संपादकों का हक है? बताने की जरूरत नहीं कि हम विभाजित वक्त में जी रहे हैं। समूची दुनिया में भरोसे की कमी एक विभीषिका के तौर पर उभर रही है। हम अक्सर अपने देश के राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक हुक्मरानों को दोष देकर चुप बैठ जाते हैं, पर यह खुद को अर्द्धसत्य की मरीचिका में धकेलने जैसा है। अगर आपको मेरी बात पर विश्वास न हो, तो कृपया एक बार अमेरिका से आने वाली खबरों और चित्रों पर गौर फरमा लीजिए। वहां अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव की मतगणना के दौरान जिस तरह की बहस हो रही थी, उसे जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन अथवा जॉन एफ केनेडी जैसे लोग सुन पाते, तो शर्म के मारे ही उनकी हृदय गति अवरुद्ध हो जाती। यही नहीं, मतगणना के दौरान जिस तरह हथियारबंद लोग खुलेआम सड़कों पर आतंक फैलाते दिखे, वह अभूतपूर्व है।