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yash15
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संकट के समय सबसे बड़ी परीक्षा देश का नेतृत्व कर रहे व्यक्ति की ही होती है और पूरी दुनिया ने देखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना सिर्फ भारत में रहने वालों की चिंता की बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों में बसे भारतीयों और वहां फँसे भारतीयों की भी चिंता की। यही नहीं भारत की विश्व कल्याण की भावना को आगे बढ़ाते हुए समय-समय पर विभिन्न जरूरत वाली दवाइयों को दुनिया के बड़े देशों को भी भेजा गया और छोटे देशों की भी सिर्फ दवा ही नहीं चिकित्सा उपकरणों और अन्न से भी मदद दी गयी। ब्राजील के प्रधानमंत्री ने तो नरेंद्र मोदी की तुलना हनुमानजी से करते हुए कहा था कि वह संजीवनी बूटी लेकर आ गये हैं। लॉकडाउन के कारण बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए तो मनरेगा का दायरा बढ़ाते हुए उसके लिए बजट में विशाल वृद्धि की गयी ताकि गरीबों, मजदूरों को आमदनी होती रहे। लोग कर्ज की किश्तों का भुगतान नहीं कर पा रहे थे तो आरबीआई ने उन्हें छह महीने के लिए राहत दी। दुनिया ने देखा कि कैसे भारत के प्रधानमंत्री समय-समय पर टीवी के माध्यम से देश को संबोधित करते हुए महामारी के खिलाफ लड़ाई में जनता का मार्गदर्शन भी कर रहे हैं और उनके लिए तमाम राहतों का ऐलान भी कर रहे हैं। यह भी पहली बार हुआ कि देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उद्योगपतियों, कंपनियों और अन्य नियोक्ताओं से हाथ जोड़ कर अपील की कि अपने कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं काटें। उद्योग के जो भी क्षेत्र मंदी की गिरफ्त में आये उनके लिए तमाम प्रोत्साहन दिये गये। अंतरिक्ष समेत नये-नये क्षेत्रों को निजी कंपनियों के लिए खोला गया। इसके साथ ही पहली बार 20 लाख करोड़ रुपए का राहत पैकेज जनता के लिए पेश किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान सिर्फ भारत में कोरोना की रोकथाम तक ही नहीं रहा बल्कि उन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से पहले सार्क देशों की बैठक की पहल की ताकि पड़ोस में यह महामारी थमे और इससे एकजुटता के साथ लड़ा जा सके। इसके बाद उन्होंने तमाम वैश्विक मंचों की बैठक बुलाने की पहल की और भारत ने दिखाया कि संकट के समय अपना ख्याल रखते हुए पूरी दुनिया की चिंता कैसे की जाती है और दुनिया की मदद कैसे की जाती है।
शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में मुख्यमंत्रियों के साथ इतना संवाद किया होगा जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ एक वर्ष में किया।