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KamleshKrGupta


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ारे देश में कानपुर वाले डॉन के ही चर्चे हुए। उसको पालने वाले असली हीरो गुमनामी में रह गए। सारा यश वह अकेले ले गया। चूंकि अब ‘कानपुर वाला’ ‘परलोकपुर वाला’ हो गया है। इसलिए उसको बुलाकर तो पूछ नहीं सकते। हां, अगर वह जिंदा जेल यात्रा पर जाता, तो अवश्य सब पालकों का ऋण उतार देता। सब कुछ करके भी गुमनामी में रहने वालों के लिए यह शेर कह दिया जाता है-...‘नाम था अपना.. पता भी.. दर्द भी.. इजहार भी, पर हमेशा दूसरों की मार्फत समझे गए, वक्त की दीवार पर पैगंबरों के लफ्ज भी, बेख्याली में घसीटे दस्तखत समझे गए’। लेकिन डॉन पालकों का दुर्भाग्य कितना बड़ा है। उनको तो यह शेर भी तसल्ली नहीं देता। वे बेचारे तो किसी की भी मार्फत कहां समझे गए! उनको लेकर बहुत अस्पष्टता है। वह तो वक्त की दीवार पर पैगंबरों के लफ्ज..वाला शेर भी नहीं कह सकते। उन बेचारों ने डॉन की क्राइम वॉल पर घसीटे हुए दस्तखत भी नहीं किए, जो उनको नाम दिला देता। अब समस्या यह है कि पालक खुद आकर अपना नाम नहीं बताने वाले। बड़े बड़ाई करें.. बड़े बोलें बोल.. रहिमन हीरा कब कहै.. लाख टका मेरा मोल। जी हां, वहुत बड़े लोग अपनी बड़ाई खुद कहां करते हैं? और फिर बड़े भी इतने! जिन्होंने इतना यशस्वी अपराधी इतना पाला है कि अपराध का वटवृक्ष बन गया, इतने गहरे लोग अपनी प्रशंसा खुद नहीं करेंगे न। डॉन के पालकों उसके महान कार्यों के संचालकों के नाम जानने को बच्चा-बच्चा आतुर है। अब पुलिस इस अभियान में जुटी तो है, देखिए क्या निकलता है? भारत में पुलिस की एक खासियत है कि वह जुटती बहुत है। कई मामलों में दशकों से जुटी है। अगर पुलिस कुछ ज्ञात-अज्ञात कारणों से डॉन के सिर पर हाथ रखने वालों के सामने नहीं ला पाती, तो तसल्ली देने के लिए ये शेर काफी होगा-‘शिकस्त-ओ-फतह नसीबों से है वाले मीर.. मुकाबला तो दिल-ए-नतवां ने खूव किया।’ डॉन विकास योजना के कर्णधारों की गुमनामी भारत को सताती रहेगी।
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