words per minute
9
chiragcomputerclasse
00:00
Speed
स्वामी विवेकानंद ने अल्प आयु में सन्यास धारण कर लिया था। उन्होंने गृहस्ती छोड़कर नर सेवा से नारायण सेवा का संकल्प लिया था। समाज कल्याण और उनके उत्थान के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। वेद-वेदांत, धर्म आदि के महत्व को जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए वह संघर्षरत थे। एक समय की बात है स्वामी जी को अपने आश्रम लौटना था। वह तांगे से उतरकर वृक्ष की छांव में बैठ गए। वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे काफी समय हो गया। कुछ समय बाद वहां से सभी लोग चले गए, फिर भी स्वामी जी वहां यथास्थिति बैठे रहे। एक सज्जन स्वामी जी को काफी देर से देख रहा था। उसके मन में जिज्ञासा हुई, चलकर हाल पूछा जाए। स्वामी जी के पास पहुंच कर शिष्टाचार से प्रणाम कर, उनका हालचाल जाना। स्वामी जी ने बात में सज्जन व्यक्ति को बताया उनके पास आगे की यात्रा करने की राशि नहीं है, इसलिए वह यहां विश्राम करने को रुक गए। सज्जन व्यक्ति के पूछने पर स्वामी जी ने बताया उन्होंने कल से कुछ खाया पिया भी नहीं है। वह व्यक्ति स्वामी जी को अपने घर ले गया, घर में उनका खूब आदर-सत्कार हुआ। सज्जन व्यक्ति के पूछने पर कि उनके थैले में क्या है? स्वामी जी ने बताया एक गीता की पुस्तक और बाइबल है। व्यक्ति को आर्श्चय हुआ। दो धर्म की पुस्तकें उनके थैले में एक साथ कैसे? स्वामी जी ने बताया अपने धर्म में संप्रदाय-पंथ आदि का कोई दुराग्रह नहीं है। हमें किसी भी माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति हो, वह मार्ग कोई भी हो सकता है। व्यक्ति ने प्रश्न किया सन्यास जीवन में किसकी आवश्यकता अधिक होती है। इस पर स्वामी जी ने कहा सन्यास जीवन में स्वयं की होती है, उसके अतिरिक्त किसी और की नहीं। जो सदाचरण करता है, उससे बढ़कर कोई और सन्यासी नहीं हो सकता।