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rakesh_chaturvedi


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नुशासन का अर्थ है शासन या नियमों के अनुसार चलना। मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है। समाज में उसे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना है। इसके लिए समाज में कुछ नियम बने होते हैं और उन नियमों के अनुसार चलने से शान्ति बनी रहती है। यदि लोग इन नियमों का पालन करें तो समाज में जंगल का राज्‍य हो जाएगा। अनुशासन का अर्थ बहुत विस्‍तृत है। इसमें बहुत सी बातें जाती हैं। स्‍कूल के नियमों का पालन करना, बड़ों की आज्ञा मानना, समय पर स्‍कूल जाना, स्‍कूल में प्रत्‍येक कार्य नियम के अनुसार करना, आदि अनुशासन के ही अंग हैं। वास्‍तव में अनुशासन का महत्‍व जीवन के हर क्षेत्र में होता है। यदि देखा जाए तो अनुशासन का आरम्‍भ उसी समय हो जाता है जब बच्‍चे का जन्‍म होता है। मां बच्‍चें को निश्चित समय पर दूध देती है, निश्चित समय पर उसका शौच आदि का कार्य करती है। समय पर सोना, समय पर उठना सिखाती है। रोज के काम नियमानुसार करना सिखाती है। घर में जो वस्‍तुएं जहां से उठाई जाएं उन्‍हें वहीं पर रखना सिखाती है। वास्‍तव में अनुशासन एक ऐसा गुण है जिसे गुरु के उपदेशों से, पुस्‍तकों से या अन्‍य किसी साधन से उतना नहीं सीखा जा सकता जितना देखकर सीखा जाता है। बच्‍चा अपने बड़ों को जैसा करता हुआ देखता है, वह भी वैसा ही करने लग जाता है। अतः बच्‍चों को अनुशासित बनाने के लिए जरूरी है कि घर में पति-पत्‍नी का अपना जीवन अनुशासित हो। यदि घर में अनुशासन होगा तो बच्‍चे पर उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। जब वह स्‍कूल जाएगा तो स्‍कूल के अनुशासन में अपने आपको नहीं ढाल सकेगा। वास्‍तव में मानव जीवन की सफलता अनुशासन में है। व्‍यापार में, कार्यालयों में, कारखानों में हर स्‍थान पर अनुशासन में रहकर काम करने से सफलता पैरों को चूमती है। बड़े दुर्भाग्‍य की बात है कि आज जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन की बड़ी कमी है। स्‍कूलों-कालेजों में तो अनुशासन की बहुत कमी है। इसके लिए विद्यार्थियों को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन वास्‍तविकता यह है कि आज का अध्‍यापक, आज के माता-पिता, आज के अधिकारी कोई भी तो अपने आप को अनुशासन में नहीं रखते। जब अध्‍यापक समय पर क्‍लास में नहीं आता, परीक्षा में निरीक्षण-कार्य करने की बजाए कमरे से बाहर खड़ा होकर गप्‍पें हांकता है, धूम्रपान करता है, उचित मार्ग से जाने की बजाए वह लान को लांघ कर जाता है तब हम यह कैसे आशा कर सकते हैं कि छात्र अनुशासन में रहना सीखें। कार्यालयों में तो और भी बुरी दशा है। कार्यालय खुलने का समय 9 बजे है, तो अधिकारी 10 बजे घर से चलता है। दोपहर के भोजन के लिए एक बजे की बजाए 12 बजे ही चल देता है। लौट कर 2 बजे की बजाए 3 बजे आता है तो फिर वह कैसे आशा रख सकता है कि उसके अधीन लोग समय पर आएं और काम करें। प्रश्‍न यह है कि अनुशासन कैसे स्‍थापित किया जाए। वास्‍तव में इसका आरम्‍भ ऊपर से होना चाहिए। स्‍कूलों-कालेजों में अध्‍यापक, मुख्‍याध्‍यापक, प्रिंसीपल, दफतरों में अधिकारी, घरों में माता-पिता स्‍वयं अनुशासन में रहकर आदर्श स्‍थापित करें तो कोई कारण नहीं कि अनुशासन का अभाव हो।
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