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rameshwar_pandey
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अधीनस्थ न्यायालयों को उस समय अत्यधिक सावधान रहना चाहिए जव वह मृत्युकालिक कथन पर कर रहे हों क्योंकि उसको करने वाला प्रतिपरीक्षा के समय मौजूद नहीं रहता है जो अभियुक्त व्यक्ति के बहुतकठिन होता हे। मृत्युकालिक कथन पर करने में यांत्रिक दृष्टिकोण अपनाना नअनुचित है क्योंकि वह अत्यधिक खतरनाक होता है। न्यायालय को यह के लिए कि क्या मृत्युकालिक कथन स्वेच्छया सत्य एवं सचेत अवस्था में गया है और उन उपस्थित संबंधियों या अन्वेषण अभिकरण जो अन्वेषण करने में हो सकते हैं या जो मृत्युकालिककथन और करनेमें उपेक्षा कर सकते हैं, के द्वारा कोई दबाव तो नहीं डाला गया है मृत्युकालिक कथन की परीक्षा दूरदर्शी नेत्रों से करना पड़ता है जब एक से अधिक मृत्युकालिक कथन है तब उन दोनों मृत्युकालिक कथन जो मात्र अभियोजनका समर्थनकरता है को स्वीकार जा सकता है जबकि अन्य मृत्युकालिक कथन को नामंजूर कर देना चाहिए, ऐसी प्रवृत्ति अधिक खतरनाक होगी। अधीनस्थ न्यायालय मृत्युकालिक कथन पर कार्य करने के पूर्णतया स्वतंत्र है और उसे दोषसिद्धि का आधार बनाया जा सकता है। जहांमृत्युकालिक कथन उपरोक्त सभी परीक्षणों से गुजर जाता है। वहां न्यायालय को मौजूद सभी परिस्थितियों पर बल देना चाहिए तथा यह स्वतंत्र चाहिएक्या गया है और क्या मृत्युकालिक कथन उचित रूप से अभिलिखित किया गया है और क्या वह स्वेच्छया एवं सत्य है। इसमें न्यायालय को मस्तिष्क का प्रयोग अवश्य करना चाहिए प्रत्येक आपराधिक एक व्यक्तिगत पहलू है। यदि सावधानीपूर्वक परीक्षा करने के बाद न्यायालयका ययह समाधान हो जाता है वह सत्य है और कथन करने के दबाव देने के भी प्रयास से स्वतंत्र है, तब इस पर व्यक्त की जा सकती है।