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पिता की संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की लोगों ने तारीफ की है। लोगों का कहना है कि इससे महिलाओं को आत्मबल मिलेगा। महिला सशक्तिकरण के लिए यह एक मजबूत कदम है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि कोर्ट के आदेश अथवा कानून का पालन सही दिशा में हो तो ही यह फायदेमंद हैं। कई बार लोग अधिकारों का दुरुपयोग करने लगते हैं। इससे रिश्तों में खटास आ जाती है। इसलिए जरूरी है कि सपंत्ति के मामले में दिए गए फैसले का लोग सदुपयोग करें। ताकि कोई महिला अपने अधिकारों से वंचित न रह सके। साथ ही तभी इस कानून की सार्थकता सामने आएगी। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि लगातार वृद्धाश्रम में बढ़ती संख्या पर भी इस फैसले के बाद रोक लगेगी। अब अपनी मां, बेटी या अन्य किसी महिला को घर से बाहर निकालने से पहले लोग 10 बार सोचेंगे। न्यायालय का फैसला बड़ा सराहनीय कदम है। यह नारी सशक्तिकरण को मजबूत बनाएगा। इससे महिलाओं के अधिकार और आर्थिक सहयोग में मदद होगी। शादी के बाद जो बेटियां पराई हो जाती थीं, ससुराल में भी पराई बुलाई जाती थीं, उनके साथ अब ऐसा नहीं हो सकेगा। वह दोनों ही जगह सम्मान की हकदार होंगी। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला प्रशंसनीय है, परंतु हम इसके दूरगामी नतीजों पर गौर करें तो इस फैसले का दुरुपयोग होने की भी आशंका है। 2005 से पहले जो लोग आपसी सहमति से संपत्ति बेच चुके हैं, वर्तमान में आपसी संबंध खराब होने व कलह बढ़ने की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 से पहले जन्मी बेटी को संपत्ति में अधिकार देकर अच्छा कदम उठाया है। यह कदम बेटियों को समानता का अधिकार देने में अच्छा साबित होगा। जन्म से ही बेटियों को यह अधिकार है, लेकिन उसके बावजूद भी वह इस अधिकार से वंचित रह जाती हैं।