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MstrBSushobhitKachhi
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अपीलकर्ता पति और प्रतिवादी पत्नी ने 02.07.2002 को हिूंद रीति-रिवाजों और रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करके वैवाहिक बंधन में बंधने का संकल्प लिया। ऐसा लगता है कि टेक-ऑफ़ स्टेज पर ही क्रैश लैडिंग हुई थी। अपीलकर्ता का दावा है कि प्रतिवादी का विचार था कि उसे उसकी सहमति के बिना अपीलकर्ता से शादी करने के लिए मजबूर किया गया था और देत रात मैरिज हॉल से निकलकर पुदुक्कोई चली गई। अपीलकर्ता के रिश्तेदारों द्वारा अगले ही दिन उसे अपीलकर्ता के साथ रहने के लिए मनाने का प्रयास फलदायी नहीं रहा। शादी कभी संपन्न नहीं हुई थी। चूंकि विवाह अपनी स्थापना के बाद से नहीं चल पाया, अपीलकर्ता ने दिनांक 25.02.2002 को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(1) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग करते हुए एक नोटिस जारी किया (जिसे इसके बाद कहा गया है कथन) आश्चर्यजनक रूप से प्रतिवादी ने इसके तुरंत बाद दाम्पत्य अधिकारों की बहाली के लिए एक याचिका दायर की। प्रतिवादी का मामला यह था कि अपीलकर्ता और उसके परिवार ने दहेज की मांग की और उपकृत करने में असमर्थ होने पर अपीलकर्ता के भाईयों ने उसे प्रतिवादी की कंपनी से दूर ले लिया, जिससे विवाह असंभव हो गया। उसका दावा है कि अपीलकर्ता ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया था। इन परिस्थितियों में अपीलकर्ता ने अधिनियम की धारा 13(1) के तहत दिनांक 25.03.2003 को दायर किया जिसके बाद से फरियादी के रूप में फिर से क्रमांकित किया गया। परीक्षण के बाद विवाह के अपरिवर्तनीय टूटने के आधार पर 23.09.2008 को लगभग 5 वर्षों के बाद तलाक की डिक्री प्रदान की गई थी। अपीलकर्ता ने ज्यादा समय बर्वाद नहीं किया और 6 दिन बाद 23.03.2008 को दूसरी शादी कर ली। प्रतिवादी ने अतिरिक्त के समक्ष अपील दायर की। जिला न्यायाधीश पुदुक्कोई यह उसका मामला है कि उसने सभी आवश्यक कागजात प्रापत करने के बाद सीमा अवधि के भीतर 01.07.2008 को अपील दायर की लेकिन अपील को 2011 के सीएमए नंबर 5 और 7 के रूप में पुन: क्रमांकित किया गया था।