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PiyushJain1241983
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वादी ने कर्ज लेने और उसके अदा करने का पूर्णत: असत्य कथन किया है। प्रतिवादी की एक अन्य भूमि खसरा नम्बर 22/1 है, जिसका रकवा 0.411 है, जिसके बारे में भी वादी ने झूठी कहानी बनाई है। वादग्रस्त भूमि खसरा नम्बर 21 मौजा बसुरिया नम्बर बंदोबस्त 303 गंगियाबाई की खुद निजी जमीन थी, जिस पर उसका कब्जा था, इस कारण वह उसकी पूर्ण स्वामी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार हो गई थी। वादी द्वारा यह दावा झूठ, मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर इस प्रतिवादी के विरूद्ध बद्यांति एवं ईर्ष्यापूर्वक प्रस्तुत किया है, जो सव्यय निरस्त किये जाने योग्य है। अत: वादी द्वारा प्रस्तुत दावा सव्यय निरस्त किया जावे। प्रतिवादी क्रमांक 02. की ओर से जबावदावा प्रस्तुत कर दावे में लिखे गये समस्त तथ्यों को स्वीकार करते हुए यह लेख किया है कि विवादित भूमि का बैनामा कर्ज की सुरक्षा में लिखाया गया था तथा बैनामा के बाद बंटिया पर विवादित भूमि प्रतिवादी क्रमांक 01 को दे दी थी, लेकिन प्रतिवादी नं. 01 ने राजस्व रिकॉर्ड में अवैध रूप से अपना नाम दर्ज करा लिया और कब्जा छोड़ नहीं रहा है। प्रकरण में प्रतिवादी क्रमांक 03 मध्यप्रदेश शासन एकपक्षीय है, उसकी ओर से कोई जबावदावा प्रस्तुत नहीं किया गया है। उभयपक्षों के अभिवचन एवं संलग्न दस्तावेजों के आधार पर विचारण न्यायालय द्वारा निम्नलिखित वादप्रश्न विरचित किये गये एवं इस प्रकार निष्कर्ष दिये गये हैं। विद्वान विचारण न्यायालय ने वादी का दावा प्रमाणित नहीं पाये जाने से दावा निरस्त किया है, जिसके विरूद्ध अपीलार्थी/वादी द्वारा यह अपील प्रस्तुत की गई हैं। अपीलार्थी/वादी द्वारा यह अपील जिन आधारों पर प्रस्तुत की गई है वह संक्षेप में इस प्रकार है कि विद्वान विचारण न्यायालय ने वाद प्रश्न क्र. 01 व 02 मंजूर करते हुए वाद भूमि अपीलार्थी की मां गंगियाबाई की मानी तथा देवी प्रसाद के नाम दर्ज भी खसरा नम्बर 121 का ही अंश माना है। विद्वान विचारण न्यायालय ने वाद प्रश्न क्रमांक 03 क्या उक्त भूमि का नामांतरण अवैध है।