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AkhilDubey


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हकि, वादपत्र के कलम नम्‍बर 04 लिखे मुताबिक गलत है स्‍वीकार नहीं। वादिया ने यह गलत लिखा है कि उक्‍त दोनों विक्रय पत्रों में विक्रेता के लगाये गये छायाचित्रों के प्रथम दृष्‍टया अवलोकन से यह दर्शित होता है कि विक्रेता स्‍वस्‍थ चित्‍त एवं मानसिक स्थिति के हिसाब से होशों-हवास में नहीं था। उक्‍त तथ्‍य वादिया के द्वारा काल्‍पनिक एवं निराधार लिखाये गये हैं। विक्रेता के सिर पर टोपा लगा होने फोटो से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह कुछ भी बोलने एवं समझने की स्थिति में नहीं है। उक्‍त तथ्‍य कल्‍पना एवं कयास के आधार पर दावे में रंगत बढ़ाने के लिए गलत लिखे गए हैं। फोटो से तो किसी की मानसिक स्थिति का परीक्षण किया जा सकता है और ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कुछ भी बोलने एवं समझने की स्थिति में नहीं है। वादिया ने यह भी गलत लिखाया है कि उक्‍त विक्रय पत्र संपत्ति हस्‍तान्‍तरण अधिनियम में बनाये गये प्रावधानों के अनुरूप होकर स्‍वस्‍थ चित्‍त एवं होशों-हवास में लिखा होने से का बिज निरस्‍ती है। बयनामा निष्‍पादन के समय उपपंजीयक के द्वारा भली-भांति फूलसिंह से बयनामा निष्‍पादन किए जाने एवं प्रतिफल राशि प्राप्‍त करने के सम्‍बन्‍ध में जांच कर उनके द्वारा बयनामा करने एवं प्रतिफल की राशि स्‍वीकार करने की स्‍वीकृति देने के पश्‍चात् ही बयनामें का निष्‍पादन किया गया है। बयनामा निष्‍पादन के समय फूलसिंह पूर्णत: स्‍वस्‍थ एवं होशों-हवास में थे। यहकि, वादपत्र की कलम नम्‍बर 04 लिखे मुताबिक गलत है स्‍वीकार नहीं। उक्‍त कलम में वादिया के द्वारा विधि के सिद्धांतों की व्‍याख्‍या की गई है। किंतु वादिया के द्वारा यह तथ्‍य प्रमाणित नहीं किया गया है कि जिस समय बयनामा का निष्‍पादन हुआ उस समय फूलसिंह स्‍वस्‍थ चित्‍त अवस्‍था में नहीं थे। वादिया के द्वारा अनावश्‍यक रूप से बयनामा पर शंका उत्‍पन्‍न की जा रही है जिसके आधार पर बयनामे निरस्‍त नहीं किये जा सकते।
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