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shubham_parteti
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केन्द्र सरकार ने पहली बार यह साहस-भरा कदम उठाने का निश्चय किया है कि रेलवे लाइन को उखाड़ने या/तोड़-फोड़ करने वालों को मृत्युदुंड दिया जाए। दुनिया के सभी देशों में राष्ट्र-द्रोहियों को चाहे वे जासूस हों या तोड़-फोड़ करने वाले, इस तरह के कठोर दण्ड दिए जाने की व्यवस्था है। सरकार ने इस आशा से कि लोगों में सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करने की भावना जागेगी इस तरह की कानूनी व्यवस्था से (1) बचने की कोशिश की। एक कारण यह भी रहा की मृत्युदण्ड समाप्त करने के पक्ष में जैसी जनभावना है, केंद्र सरकार ने उसका भी आदर करना उचित समझा। यही वजह थी कि 7 साल पूर्व जब भारतीय रेलवे कानून में संशोधित किया गया तब 3 से 7 साल तक की कठोर कैद की ही व्यवस्था की गई। लेकिन इतने दिन तक संशोधन कानून पर अमल करने के खिलाफ सरकार को (2) बाध्य होना पड़ा कि वह तोड़-फोड़ करने पर उतारू तत्वों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करे। सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों को ले जाने वाली ट्रेनों में भी तोड़-फोड़ की घटनाऐं होने के बाद सरकार के लिए और भी आवश्यक हो गया कि वह इस दिशा में शीघ्र कोई कदम उठाए।
रेल दुर्घटनाओं के संबंध में समिति ने जो रिपोर्ट दी, यह आवश्यक है कि सरकार उसकी बातों को सामने रखे। रिपोर्ट (3) में कहा गया है कि पुलिस और स्वराष्ट्र मंत्रालय रेलवे दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अपना दायित्व निभाने से कतराते हैं। रेलवे जांच के बाद जिन दुर्घटनाओं के लिए तोड़-फोड़ करने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पुलिस अपनी असहमति प्रकट करती है और जहां यह मानती है कि दुर्घटना तोड़-फोड़ के कारण हुई वहां ऐसे लोगों को गिरफ्तार करने में ढिलाई बरतती है। बांचू समिति ने कहा पुलिस ने 27 तोड़-फोड़ की घटनाओं (4) में से सिर्फ 13 को स्वीकार किया और इनमें से भी 7 घटनाओं में वह मुल्जिमों का पता लगाने में असफल रही।
एक पिछले रेलमंत्री ने राज्य पुलिस और रेलवे पुलिस के बीच असहयोग और रेलवे सम्पत्ति की सुरक्षा में पुलिस की उदासीनता के प्रश्न पर प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से बात की थी। यह भी कहा गया था कि प्रदेशों में रेलवे लाइन और रेलवे सम्पत्ति की सुरक्षा का दायित्व प्रदेश प्रशासन को संभालना चाहिए।