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Mayank_Pandit
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अध्यक्ष महोदय, आज सदन में वित्त मंत्रालय की मांगों पर बहस हो रही है। सरकार के हर विभाग का वित्त मंत्रालय से संबंध होता है। देश में जो प्रगति हुई है और हो रही है, उसकी काफी चर्चा हुई है जो प्रगति हुई है वह चारों ओर दिखाई पड़ रही है कम से कम रेलवे विभाग में तो काफी प्रगति दिखाई पड़ रही है। रेलों में अब भीड़ कम होती है बिजली का भी काफी विकास हुआ है लेकिन गांव की ओर जो हमारा दृष्टिकोण है उसको देखकर कुछ तकलीफ होती है अभी जो जनगणना हुई है उसे देखने से मालूम होता है कि शहरों की जनसंख्या अधिक बढ़ी है। आज देहातों से लोग शहरों की ओर आ रहे हैं। हमारे राष्ट्रपिता ने कहा था कि लोग गांव में बसे है गांव कुछ जीवन को पवित्र करता है। लेकिन स्वतंत्रता के 60 साल बीत जाने के बाद भी देहातों की तरफ न जाकर लोग शहरों की तरफ आते जा रहे है इस प्रश्न पर हमें कुछ गंभीरता से विचार करना होगा। यदि देहातों के लोगों को सुख-सुविधाएं मिलती जो की शहरों में प्राप्त है तो लोग देहातों से शहर की तरफ न दौड़ते बल्कि शहरों से देहातों की ओर जाते। देहात के जीवन में दो प्रकार की चीजें थी एक तो जमीदारी प्रथा और दूसरे वे लोग रहते थे जो रूपये का लेनदेन करते थे जमीदारी प्रथा समाप्त हुई जिससे लोगों को राहत मिली। जहां तक रूपये का लेनदेन का प्रश्न है पहले 25 प्रतिशत तक ब्याज लिया जाता था उसमें अब कमी हुई लेकिन कहीं-कहीं पर तो अभी भी उतना ही ब्याज लिया जाता है जिससे कर्ज लेने वाला उनके चंगुल से नहीं निकल पाता । सरकार भी अब उत्पादन दर पर कर्ज देने लगी है । इसी कारण से कही-कही पर साहूकारों के ब्याज की दर में कमी आई है लेकिन इसके बावजूद भी यदि देहातों की ओर सरकार की तुलना करते है तो उन दोनों के स्तर में काफी अंतर पाते है।