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THE_GOLU_001
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मानव के पास समस्त जगत् को देखने-परखने के दो नजरिए हैं, एक आशावादी दूसरा निराशावादी। इसे सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टि भी कहते हैं। जो आशावादी या सकारात्मक मार्ग पर चलते हैं, वे सदैव आन्नद की अनुभूति प्राप्त करते हैं तथा निराशावादी या नाकरात्मक दृष्टि वाले दुःख के सागर में डूबे रहते हैं और सदा अपने आपको प्रस्थापित करने के लिए तर्क किया करते हैं। वे भूल जाते हैं, कि तर्क और कुतर्क से ज्ञान का नाश होता है एवं जीवन में विकृति उत्पन्न होती है। आशावादी कभी तर्क नहीं करता, फलस्वरुप वह आन्तरिक आनन्द की प्रतीति करता है। वह मानता है, कि आत्मिक आनन्द कभी प्रहार या काटने की प्रक्रिया में नहीं है। किसी परम्परा का विरोध करने से ही प्रतिभा ऊपर नहीं उठता। विरोध से नाश होता है। इसीलिए जगत् में सदा आशावाद ही पनपा है, उसने ही महान व्यक्तियों का सृजन किया है। निराशावाद या नकारात्मक की नींव पर कभी किसी जीवन-प्रसाद का निर्माण नहीं हुआ।