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ूट परिसर के मालिक होने का दावा करने वाले प्रतिवादी ने कर्नाटक किराया नियंत्रण अधिनियम, 1961 की धारा 21(1) परंतुक (ए) और (एच) के तहत प्रथम अपीलकर्ता के खिलाफ एक बेदखली याचिका दायर की। (पुराना अधिनियम, संक्षेप में)। उसने आरोप लगाया कि पिछले मालिक एंथनी स्‍वामी ने एक पंजीकृत बिक्री विलेख दिनांक 25.9.1997 के तहत उसे सूट परिसर बेच दिया। प्रथम अपीलकर्ता ने यह कहते हुए बेदखली याचिका का विरोध किया कि वह प्रतिवादी के अधीन परिसर का किराएदार नहीं था। उन्‍होंने आरोप लगाया कि वह पहले 2 एंथनी स्‍वामी के तहत वर्ष 1988 से सूट परिसर के किरायेदार थे; कि उक्‍त एंथोनी स्‍वामी ने 11.6.1997 को अपने पक्ष में 105,000 रुपये के प्रतिफल पर सूट की संपत्ति को बेचने के लिए सहमति व्‍यक्‍त करते हुए बिक्री का एक समझौता किया था; और उक्‍त समझौते के तहत, एंथनी स्‍वामी ने 75,000 रुपये अग्रिम के रूप में प्राप्‍त होने की पुष्टि की और उन्‍हें (प्रथम अपीलकर्ता) बिक्री के समझौते के आंशिक प्रदर्शन के किराए से मुक्‍त कब्‍जा जारी रखने की अनुमति दी। उन्‍होंने तर्क दिया कि उस तिथि से, वह एक किरायेदार के रूप में नहीं बल्कि एक खरीदार के रूप में बिक्री के समझौते के आंशिक प्रदर्शन में रहा है और इसलिए परिसर के संबंध में किसी भी किराए का भुगतान नहीं किया है। प्रथम अपीलकर्ता ने उक्‍त एंथनी स्‍वामी और क्रेता (प्रतिवादी) के खिलाफ सिटी सिविल कोर्ट, बैंगलोर की फाइल पर ओएस नंबर 2089 में विशिष्‍ट प्रदर्शन के लिए एक मुकदमा भी दायर किया। उक्‍त वाद अभी भी लंबित है। ट्रायल कोर्ट ने आदेश दिनांक 30.6.2001 द्वारा बेदखली याचिका को यह कहते हुए अनुमति दी कि प्रथम अपीलकर्ता प्रतिवादी के अधीन किरायेदार था और प्रतिवादी ने स्‍थापित किया था कि वह वास्‍तविक और उचित रूप से सूट परिसर की आवश्‍यकता थी। उक्‍त आदेश को प्रथम अपीलकर्ता द्वारा उच्‍च न्‍यायालय में पुनरीक्षण दाखिल कर चुनौती दी गई थी। उच्‍च न्‍यायालय ने अपने आदेश दिनांक 18.10.2001 द्वारा पुनरीक्षण याचिका को स्‍वीकार कर लिया। उच्‍च न्‍यायालय ने निचली अदालत के इस निष्‍कर्ष की पुष्टि की कि प्रतिवादी और प्रथम अपीलकर्ता के बीच मकान मालिक और किरायेदार का संबंध स्‍थापित किया गया था, लेकिन यह माना गया।
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