words per minute
10
RAJEEV_AADARSH
00:00
Speed
सांप्रदायिकता जब अपना खेल खेलती है, तो आमतौर पर यही होता है। चंद दिनों के भीतर ही पूरा कर्नाटक सूखे फूस के ढेर-सा लगने लगा है, जहां हर चिनगारी अब डराती है और हर घटना आग में घी डालती हुई दिखती है। राज्य के शिवमोगा जिले में बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद पूरे कर्नाटक में जो तनाव सतह पर उभर आया है, वह पूरे देश में ही सिहरन पैदा कर रहा है। उत्तर प्रदेश में, जहां इस समय विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, वहां इस तरह की खबरें नई परेशानियां भी खड़ी कर सकती हैं। हम अभी नहीं जानते कि इस हत्या का ठीक-ठीक कारण क्या था, लेकिन जो हालात हैं, उनमें इस मामले को राज्य में चल रहे हिजाब-विवाद से जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक है। अगर यह मामला हिजाब विवाद से नहीं भी जुड़ा हो, तब भी यह विवाद को और भड़काने का काम तो करेगा ही। और अगर यह हत्याकांड हिजाब विवाद से जुड़ा है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि राजनीति एक बेवजह विवाद को निर्ममता की हद तक खींचकर ले गई है। देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो इसे किसी भी तरह हिजाब विवाद से जोड़ना चाहेंगे, क्योंकि उनके राजनीतिक हित ऐसे ही विवादों से सधते हैं। यही वजह है कि पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचे, उससे पहले ही आरोपों का ढेर लग गया है।
प्रशासन ऐसे मौकों पर खास तरह से काम करता है और उस तरह के कदम उठाए जाने की खबरें भी आ रही हैं। मूल रूप से यह विवाद स्कूल, कॉलेजों से शुरू हुआ था, इसलिए ऐसे सभी शिक्षण संस्थानों को फिलहाल बंद कर दिया गया है। सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। जिन इलाकों में तनाव बढ़ने की आशंका है, पुलिस ने उन सभी इलाकों की बैरीकेडिंग कर दी है। ऐसे प्रयासों के पीछे दरअसल कोशिश यही रहती है कि अगर कुछ लोगों में गुस्सा है या फिर किसी किस्म की अफवाहें वगैरह अगर लोगों को उत्तेजित कर रही हैं, तो टकराव की आशंकाओं को लगातार कम किया जाए। लेकिन ऐसे ही मौके पर हमें राज्य के एक मंत्री का ऐसा बयान सुनाई देता है, जो प्रशासन के इन प्रयासों पर पानी फेर सकता है।
बेशक, आग में घी डालने वाले और भी हैं। कर्नाटक में पिछले कुछ दिनों से जो कुछ हो रहा है, वह बताता है कि किसी भी तनाव के बाद शांति कायम करने वाले लोग समाज में लगातार कम होते जा रहे हैं। पक्ष और विपक्ष के ऐसे बयान लगातार ही सुनाई दे रहे हैं, जो विवाद को किसी भी तरह से ठंडा नहीं होने देंगे। इन सबकी शह पर कुछ ऐसे संगठन भी सक्रिय हैं, जो एक नितांत संवेदनशील मुद्दे का निपटारा सड़कों पर ही कर लेना चाहते हैं। समाज के बुद्धिजीवी तबके ने भी सब कुछ अदालत के भरोसे छोड़ दिया है। मुमकिन है कि अदालत हिजाब विवाद को किसी अंजाम तक पहुंचा दे, लेकिन इस बीच जो तनाव बढ़ेगा, हो सकता है, कल को वह भड़कने का कोई और बहाना खोज ले। इसलिए प्राथमिकता इसी तनाव को घटाने की होनी चाहिए। अचानक ही हमारा पूरा समाज उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सहिष्णुता की बात करने वाले लोग बहुत कम हो गए हैं। इन स्थितियों को अगर जल्दी से जल्दी नहीं बदला गया, तो आज हम जो कर्नाटक के स्तर पर देख रहे हैं, वही हालात हमें देश के दूसरे हिस्सों में भी परेशान कर सकते हैं।