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राम और श्याम दो भाई थे, दोनों एक ही विद्यालय में पढ़ा करते थे और यहाँ तक कि एक ही कक्षा में किन्तु राम पढ़ने में होनहार था वहीं उसका भाई श्याम पढ़ने से बचता था, और न पढ़ने के ढेरों बहाने ढूँढता था। राम के दोस्त पढ़ने वाले थे और श्याम के दोस्त न पढ़ने वाले और कामचोरी करने वाले थे राम अपने भाई श्याम को उन दोस्तों से बचने के लिए कहा करता, मगर श्याम उसे डांट लगा देता और कहता कि अपने काम से काम रखा करो। श्याम के दोस्त घर से स्कूल जाने के लिए निकलते और रास्ते में कहीं और चले जाते। कभी पार्क में बैठते कभी जाकर खाना-पीना करते, और कभी फिल्म देखा करते थे। श्याम भी उनकी संगति में आ गया और वह भी धीरे-धीरे स्कूल जाने से बचता रहता। श्याम भी उन दोस्तों के साथ-पीना और घूमना करता राम उसके इस प्रकार की धोखाधड़ी से बहुत चिन्तित था। श्याम से परीक्षा में फेल होने की बात भी कही मगर श्याम ने नहीं माना एक दिन की बात है श्याम स्कूल जा रहा था उसके दोस्त मिल गए और उन्होंने कहा आज स्कूल नहीं जाना है हम सभी अपने दोस्त हरी को जन्मदिवस मनाएंगे और बाहर खाना-पीना करेंगें और खूब मजे करेंगे। पहले तो श्याम ने मना किया किन्तु दोस्तों के बार बार बोलने पर वह उनके साथ चला गया श्याम और उसके मित्रों ने खूब पार्टी करी और उस दिन स्कूल नहीं गए इसप्रकार का काम वह और उसके दोस्त निरंतर करते रहते।
परीक्षा हुई जिसमें श्याम और उसके दोस्त सफल नहीं हो पाए वह फेल हो गए। राम ने इस बार भी और बार की तरह प्रथम स्थान प्राप्त किया, श्याम अपने घर मार्कशीट ले गया जिस पर उसके माता-पिता ने देखा और बहुत उदास हुए उन्हें उदासी हुई कि एक मेरा बेटा इतना अच्छा पढ़ने में है और दूसरा नालायक है।
श्याम किसी भी विषय में पास नहीं हो पाया। श्याम के माता पिता को बहुत दुख हुआ और उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। मगर अन्दर ही अन्दर वह बहुत दु:खी होते रहे।
उन्होंने सोचा कि अब मैं दूसरे लोगों को क्या बताउँगा कि मेरा बेटा एक भी विषय में पास नहीं हो पाया। इसप्रकार मां पिता जी ने श्याम बहुत चिन्तित व दु:खी देखा जिसपर उसे भी दुख हआ। श्याम ने अपने मां-बार को भरोसा दिलाया कि मैं अगली परीक्षा में सफल होकर दिखाउंगा। श्याम ने अपने उन सब दोस्तों को छोड़ दिया , जिन्होंने उसकी सफलता में उसका मार्ग रोका था, उन सभी छल और कपट करने वाले दोस्तों को छोड़कर अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाया, नतीजा यह हुआ कि साल भर की मेहनत से वह परीक्षा में सफल ही नहीं अपितु विद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इस पर उसके माता-पिता को बहुत खुशी हुई और अपने पुत्र श्याम को गले से लगाया और उन्हें शाबासी दी, श्याम को पता चल गया था कि जैसी संगति मिलेगी वैसा परिणाम मिलेगा।