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म्‍पत्ति का अंतरण अधिनियम अंतर्गत लगभग तो सभी धाराएं महत्व पूर्ण है। कुछ धाराएं महत्व पूर्ण होने के साथ छोटी भी हैं पर इस अधिनियम में उन धाराओं का मान बड़ी धाराओं के समक्ष ही है इस आलेख के अंतर्गत सम्‍पत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 27 से 34 तक की व्यामख्याू की जा रही है पिछले आलेख के अंतर्गत पूर्ववर्ती शर्त ओर पुरोभाव्या शर्त की पूर्ती पर टीका किया गया था। इस धारा का उद्देश्‍य अंतरण के आदेश को तब प्रभावी बनाना है जबकि पूर्विक हित विफल हो गया हो1 इसे इंग्लिेश कानून के अंतर्गत त्वरित प्राप्ति का सिद्धांत कहा जाता है, क्योंकि पुर्विक हित के असफल होने के पश्‍चात यह तुरंत उत्तरवर्ती अंतरिती में निहित हो जाता है दूसरे शब्दों में उत्तरवर्ती अंतरिती का हित समय से पहले अस्तित्व में जाता है उदाहरणार्थ गोपाल नें रामू को 50000 रूपये इसी शर्त पर अंतरित किये कि गोपाल की मृत्यु के तीन महीने के भीतर ही निर्दिष्ट पट्टाकरण देगा। यदि निर्दिष्ट पट्टाकरण दिया गया तो 500 रूपये रामू को मिलेगे, गोपाल की ही जिंदगी में रामू मर जाता है। तो पक्ष में किया गया अंतरण तुरंत प्रवर्तनीय हो जाएगा, यद्यपी कालू को निर्दिष्ट शर्त को पूरा करने का मौका ही नहीं मिल सका। इस सिद्धांत के लागू होने के लिए यह आवश्यतक है कि संपत्ति का अंतरण सर्वप्रथम एक व्यक्ति को किया जाए और उसके बाद दूसरे व्‍यक्ति को किया जाये। पहले व्यवक्ति के पक्ष में किया गया अतरंण वैध होना चाहिए यदि वह वैध नहीं हो तो उत्तरवर्ती अंतरण में भी अवैध हो जाएगा। शर्ते ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसका अनुपालन असंभव हो। जबकि पूर्विक हित असफल हो जाता है तब उत्तरवर्ती हित प्रभावित होता है। पूर्विक हित पक्षकारों द्वारा निर्धा‍रित या भिन्न रीति से विफल हो सकता है और उसके विफल होते ही उत्तररवर्ती हित प्रभावी हो जाएगा। मानों कोई पूर्व हित अंतरण की तारीख से ही हो।
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