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Ganga_Bhosle
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अस्थायी व्यादेश जारी किये जाने के लिए प्रथम दृष्टया प्रकरण, सुविधा तथा अपरिमित क्षति बिंदुओं का आवेदक वादी के पक्ष में प्रमाणित होना आवश्यक है। अत: अस्थायी व्यादेश जारी करने के उपरोक्त सुनिश्चित सिंद्धांतो को दृष्टिगत रखते हुए वादी के आवेदन का निराकरण किया जा रहा है। आवेदन के समर्थन में आवेदक आनंद कुमार और राकेश राय द्वारा शपथ पत्र पेश किया गया है जिसके खंडन व जवाब के समर्थन में अनावेदक राज्यपाल द्वारा प्रतिशपथ पत्र पेश किया गया है। यह तत्व निर्विवादित है कि दिनांक 28.01.2010 को एक इकरार नामा पथरिया जाट स्थित खसरा नंबर 412/1 में .35 डिसमिल भूमि 11 लाख रुपये में विक्रय का प्रतिवादी गण द्वारा वादीगण के पक्ष में निष्पादित किया गया और बयाना के रूप में 2 लाख रुपये चेक से और 1 लाख रुपये नगद प्रतिवादी द्वारा वादी से प्राप्त कर कुल 3 लाख रुपये प्राप्त किये गये और इकरार नामा के अनुसार छ: माह के अंदर विवादित भूमि का विक्रय पत्र रजिस्टर्ड कराकर प्रतिवादी गण द्वारा कब्जा वादी को सौंपा जाना था, लेकिन रजिस्ट्री न होने से वादीगण द्वारा यह दावा प्रतिवादीगण के विरूद्ध पेश किया गया। वादीगण का कहना है कि वे बेनामा कराने के लिए सदैव तत्पर रहे लेकिन प्रतिवादीगण द्वारा जान-बूझकर बेनामा कराने में रुचि नहीं ली गयी जबकि इसके विपरित प्रतिवादीगण का कहना हैै कि उन्होंने 6 माह के अंदर ही विवादित भूमि के विक्रय की रजिस्ट्री कराने का प्रयास किया था तथा वादी गण को सूचना भी दी, लेकिन वादीगण शेष राशि देकर रजिस्ट्री कराने के लिए तत्पर नहीं रहे। यह साक्ष्य का विषय है कि कौन पक्ष तत्पर था और किसके द्वारा रजिस्ट्री कराने में रुचि नहीं ली गयी प्रकरण की इस अवस्था पर महत्वपूर्ण यह है कि क्या वाद के दौरान प्रतिवादीगण विवादित भूमि के विक्रय करने पर अमादा है?
उक्त संबंध में वादी का कहना है कि प्रतिवादी गण दलालों से बात कर रहे हैं और उनके द्वारा राकेश राय और अन्य से संपर्क किया गया है इस संबंध में प्रतिवादीगण का कहना है कि उनके द्वारा आज दिनांक तक विवादित भूमि को विक्रय नहीं किया गया। अत: उपरोक्तानुसार प्रथम दृष्टि में यह प्रकट होता है कि वादीगण और प्रतिवादीगण के मध्य भूमि को विक्रय किये जाने का इकरारनामा निष्पादित हुआ है और वादीगण द्वारा बयाना राशि भी अदा की गयी है और प्रतिवादीगण विवादित भूमि को किसी अन्य को अंतरित करने के प्रयास में है।
अत: राकेश राय के शपथ पत्र को तथा वादी व प्रतिवादीगण के मध्य हुए विवादित भूमि के इकरारनामा को देखते हुए प्रथम दृष्टया प्रकरण वादीगण के पक्ष में प्रमाणित होता है और यदि विवादित भूमि को प्रतिवादी द्वारा किसी अन्य को विक्रय किया गया तो वादीगण का अपरिमित क्षति होने की आ
शंका को नकारा नहीं जा सकता और इसके साथ-साथ वाद बाहुल्यता भी बढ़ेगी जबकि सुविधा का संतुलन वादीगण के पक्ष में है।