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YanuLama


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ीवन में हर पहलू में, वो चाहे सांसारिक हो या आध्‍यात्मिक, मार्गदर्शन की आवश्‍यकता पड़ती है। इसीलिए शिक्षा से लेकर धर्म अध्‍यात्‍म का वृहद् तंत्र खड़ा है। शिक्षकों एवं गुरूजनों का मार्गदर्शन तथा आशीर्वाद शिष्‍यों एवं साधकों के जीवन में गति लाते हैं, प्राण फूंकते हैं अभीष्‍ट लक्ष्‍य की ओर गतिशील करते हैं, लेकिन इतने भर से सब कुछ नहीं हो जाता। मंजिल के अंतिम मुकाम तक व्‍यक्ति को अपने ही बलबूते पहुंचना होता है अर्थात् अपने पुरूषार्थ को करने के अतिरिक्‍त कोई विकल्‍प नहीं। जीवन में एक दौर ऐसा आता है, जब प्रत्‍यक्ष मार्गदर्शन उपलब्‍ध नहीं हो पाता और यदि यह रहता भी है तो अपनी पात्रता के अभाव में इसका सीधा लाभ व्‍यक्ति नहीं ले पाता। बाहरी अवलंबन पर अतिशय एवं अनावश्‍यक निर्भरता व्‍यक्ति के स्‍वतंत्र विकास में बाधक भी बनती है। इससे बाहर निकलकर अंतत: साधक शिष्‍य एवं मुमुक्षु को अकेले ही आगे बढ़ना होता है। जैसे पर्वतारोहण हो या कोई खेल या अन्‍य कला एवं विधा, शिक्षक की भूमिका प्राथमिक प्रशिक्षण देने के स्‍तर के बाद समाप्‍त हो जाती है। आगे शिष्‍य को अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी मंजिल तक दूरी स्‍वयं ही तय करनी होती है। अध्‍यात्‍म पथ पर तो यह नियम विशेष रूप से लागू होता है, जहां नित चेतना के नए रहस्‍य उद्घाटित हो रहे होते हैं, साधक रोज नई चुनौतियों का सामना कर रहा होता है। बाहर मार्गदर्शन की बैसाखी का अभ्‍यस्‍त मन ऐसे में अधिक दूर नहीं जा सकता। हर बात के लिए मार्गदर्शन का मुंह ताकते रहने के कारण स्‍वतंत्र चिंतन एवं अंत:स्‍फूर्त प्रेरणा कूंद पड़ने लगती है। ऐसे में बिना गुरू के सान्निध्‍य के स्‍वयं पथ के आरोहण की वह सोच भी नहीं पाता। एक तरह से साधक आंतरिक विकास की दृष्टि से कंफर्ट जोन में रह रहा होता है, जिसके बाहर निकलने का साहस वह नहीं कर पाता और एकतरफे कर्मकांडीय ढर्रे पर उसका साधना पथ बढ़ रहा होता है।
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